महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 829, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरानेवाला नहीं होता, क्योंकि महात्मा युधिष्ठिरको (जो सदा धर्मका ही पालन करते हैं) जटाधारी होकर वल्कल वस्त्र पहने वनमें रहते हुए महान् क्लेश भोगना पड़ रहा है ।। ५ ।। दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति ** न चास्य भूमिविवरं ददाति ।** धर्मादधर्मश्चरितो वरीया- ** नितीव मन्येत नरोऽल्पबुद्धिः ।। ६ ।।** दुर्योधने चापि विवर्धमाने ** युधिष्ठिरे चासुखमात्तराज्ये ।** किं त्वत्र कर्तव्यमिति प्रजाभिः ** शङ्का मिथः संजनिता नराणाम् ।। ७ ।।**
उधर, दुर्योधन (अधर्मपरायण होनेपर भी) पृथ्वीका शासन कर रहा है। उसके लिये यह पृथ्वी भी नहीं फटती है। इससे तो मन्द बुद्धिवाले मनुष्य यही समझेंगे कि धर्माचरणकी अपेक्षा अधर्मका आचरण ही श्रेष्ठ है। दुर्योधन निरन्तर उन्नति कर रहा है और युधिष्ठिर छलसे राज्य छिन जानेके कारण दुःख उठा रहे हैं। (युधिष्ठिर और दुर्योधनके दृष्टान्तको