भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 830, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 830

सामने रखकर) मनुष्योंमें परस्पर महान् संदेह खड़ा हो गया है। प्रजा यह सोचने लगी है कि हमें क्या करना चाहिये—हमें धर्मका आश्रय लेना चाहिये या अधर्मका? ।। ६-७ ।। अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो धर्मे धृतः सत्यधृतिः प्रदाता । चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत् ।। ८ ।। ये राजा युधिष्ठिर साक्षात् धर्मके पुत्र हैं। धर्म ही इनका आधार है। ये सदा सत्यका आश्रय लेते और दान देते रहते हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख छोड़ सकते हैं, (परंतु धर्मका त्याग नहीं कर सकते) भला, धर्मसे दूर होकर कोई कैसे अभ्युदयका भागी हो सकता है? ।। ८ ।। कथं नु भीष्मश्च कृपश्च विप्रो द्रोणश्च राजा च कुलस्य वृद्धः । प्रव्राज्य पार्थान् सुखमाप्नुवन्ति धिक् पापबुद्धीन् भरतप्रधानान् ।। ९ ।। पितामह भीष्म, ब्राह्मण कृपाचार्य, द्रोण तथा कुलके बड़े-बूढ़े राजा धृतराष्ट्र—ये कुन्तीके पुत्रोंको राज्यसे निकालकर कैसे सुख पाते हैं? भरतकुलके इन प्रधान व्यक्तियोंको धिक्कार है! क्योंकि इनकी बुद्धि पापमें लगी हुई है ।। ९ ।। किं नाम वक्ष्यत्यवनिप्रधानः पितॄन् समागम्य परत्र पापः । पुत्रेषु सम्यक् चरितं मयेति पुत्रानपापान् व्यपरोप्य राज्यात् ।। १० ।। पापी राजा धृतराष्ट्र परलोकमें पितरोंसे मिलनेपर उनके सामने कैसे यह कह सकेगा कि 'मैंने अपने और भाई पाण्डुके पुत्रोंके साथ न्याययुक्त बर्ताव किया है।' जबकि उसने इन निर्दोष पुत्रोंको राज्यसे वञ्चित कर दिया है ।। १० ।। नासौ धिया सम्प्रति पश्यति स्म किं नाम कृत्वाह मचक्षुरेवम् । जातः पृथिव्यामिति पार्थिवेषु प्रव्राज्य कौन्तेयमिति स्म राज्यात् ।। ११ ।। वह अब भी अपने बुद्धिरूप नेत्रोंसे यह नहीं देख पाता कि कौन-सा पाप करनेके कारण मुझे इस प्रकार अन्धा होना पड़ा है और आगे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राज्यसे निकालकर जब मैं भूतलके राजाओंमें फिरसे जन्म लूँगा, तब मेरी दशा कैसी होगी? ।। ११ ।। नूनं समृद्धान् पितृलोकभूमौ

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