महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 831, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचामीकराभान् क्षितिजान् प्रफुल्लान् । विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः कृत्वा नृशंसं बत पश्यति स्म ॥ १२ ॥ विचित्रवीर्यका पुत्र धृतराष्ट्र और उसके पुत्र दुर्योधन आदि यह क्रूर कर्म करके (स्वप्नमें) निश्चय ही पितृलोककी भूमिमें सुवर्णके समान चमकनेवाले समृद्धिशाली एवं पुष्पित वृक्षोंको देख रहे हैं* ॥ १२ ॥
व्यूढोत्तरांसान् पृथुलोहिताक्षान् नेमान् स्म पृच्छन् स शृणोति नूनम् । प्रास्थापयद् यत् सवनं सशङ्को युधिष्ठिरं सानुजमात्तशस्त्रम् ॥ १३ ॥ धृतराष्ट्र सुदृढ़ कंधे तथा विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले इन भीष्म आदिसे कोई बात पूछता तो है, परंतु निश्चय ही उनकी बात सुनकर मानता नहीं है, तभी तो भाइयोंसहित शस्त्रधारी युधिष्ठिरके प्रति भी मनमें शंका रखकर इन्हें उसने वनमें भेज दिया है ॥ १३ ॥
योऽयं परेषां पृतनां समृद्धां निरायुधो दीर्घभुजो निहन्यात् । श्रुत्वैव शब्दं हि वृकोदरस्य मुञ्चन्ति सैन्यानि शकृत् समूत्रम् ॥ १४ ॥ (भला! वे कौरव इन पाण्डवोंका सामना कैसे कर सकते हैं?) ये बड़ी-बड़ी भुजाओंवाले भीमसेन बिना अस्त्र-शस्त्रोंके ही शत्रुओंकी शक्तिशाली सेनाका संहार कर सकते हैं। भीमका तो सिंहनाद सुनकर ही विरोधी दलके सैनिक मल-मूत्र करने लगते हैं ॥ १४ ॥
स क्षुत्पिपासाध्वकृशस्तरस्वी समेत्य नानायुधबाणपाणिः । वने स्मरन् वासमिमं सुघोरं शेषं न कुर्यादिति निश्चितं मे ॥ १५ ॥ वे ही वेगशाली भीम इन दिनों भूख-प्यास और रास्ता चलनेकी थकावटसे दुर्बल हो गये हैं। इस भयंकर वनवासका स्मरण करते हुए जब ये हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र एवं धनुष-बाण लिये शत्रुओंपर आक्रमण करेंगे, उस समय किसीको भी जीता न छोड़ेंगे—यह मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
न ह्यस्य वीर्येण बलेन कश्चित् समः पृथिव्यामपि विद्यतेऽन्यः । स शीतवातातपकर्शिताङ्गो न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ॥ १६ ॥