भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

आपृष्टो मेऽसि कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि भारत ॥ ३१ ॥
वीरवर! निश्चय ही आपके चले जानेके बाद आपके सभी भाई जागते समय आपहीके पराक्रमकी चर्चा बार-बार करते हुए अपना मन बहलायेंगे। पार्थ! दीर्घकालके लिये आपके प्रवासी हो जानेपर हमारा मन न तो भोगोंमें लगेगा और न धनमें ही। इस जीवनमें भी कोई रस नहीं रह जायगा। आपके बिना हम इन वस्तुओंसे संतोष नहीं पा सकेंगे। पार्थ! हम सबके सुख-दुःख, जीवन-मरण तथा राज्य-ऐश्वर्य आपपर ही निर्भर हैं। भरतकुलतिलक! कुन्तीकुमार! मैंने आपको विदा दी; आप कल्याणको प्राप्त हों ॥ २८—३१ ॥

बलवद्भिर्विरुद्धं न कार्यमेतत् त्वयानघ ।
प्रयाह्यविघ्नेनैवाशु विजयाय महाबल ।
नमो धात्रे विधात्रे च स्वस्ति गच्छ ह्यनामयम् ॥ ३२ ॥
निष्पाप महाबली आर्यपुत्र! आप बलवानोंसे विरोध न करें, यह मेरा अनुरोध है। विघ्न-बाधाओंसे रहित हो विजयप्राप्तिके लिये शीघ्र यात्रा कीजिये। धाता और विधाताको नमस्कार है। आप कुशल और स्वस्थतापूर्वक प्रस्थान कीजिये ॥ ३२ ॥

ह्रीः श्रीः कीर्तिर्द्युतिः पुष्टिर्मा लक्ष्मीः सरस्वती ।
इमा वै तव पान्थस्य पालयन्तु धनंजय ॥ ३३ ॥
धनंजय! ह्री, श्री, कीर्ति, द्युति, पुष्टि, उमा, लक्ष्मी और सरस्वती—ये सब देवियाँ मार्गमें जाते समय आपकी रक्षा करें ॥ ३३ ॥

ज्येष्ठापचायी ज्येष्ठस्य भ्रातुर्वचनकारकः ।
प्रपद्येऽहं वसून् रुद्रान्रादित्यान् समरुद्गणान् ॥ ३४ ॥
विश्वेदेवांस्तथा साध्याञ्छान्त्यर्थं भरतर्षभ ।
स्वस्ति तेऽस्त्वन्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च भारत ॥ ३५ ॥
दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यो ये चान्ये परिपन्थिनः ।
आप बड़े भाईका आदर करनेवाले हैं, उनकी आज्ञाके पालक हैं। भरतश्रेष्ठ! मैं आपकी शान्तिके लिये वसु, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण, विश्वेदेव तथा साध्य देवताओंकी शरण लेती हूँ। भारत! भौम, आन्तरिक्ष तथा दिव्य भूतोंसे और दूसरे भी जो मार्गमें विघ्न डालनेवाले प्राणी हैं, उन सबसे आपका कल्याण हो ॥ ३४-३५½ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वाऽऽशिषः कृष्णा विरराम यशस्विनी ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! ऐसी मंगलकामना करके यशस्विनी द्रौपदी चुप हो गयी ॥ ३६ ॥

ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भ्रातॄन् धौम्यं च पाण्डवः ।
प्रतिष्ठत महाबाहुः प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥ ३७ ॥