भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 287

'कुन्तीकुमार! तुम अपने मनमें जो-जो इच्छा रखते हो, वह सब तुम्हें शीघ्र प्राप्त हो।' इसके बाद ब्राह्मणोंने अर्जुनको विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए कहा—'कुन्तीपुत्र! तुम अपना अभीष्ट साधन करो, तुम्हें अवश्य विजय प्राप्त हो' ।। २२ १/२ ।।
तं तथा प्रस्थितं वीरं शालस्कन्धोरुमर्जुनम् ।। २३ ।।
मनांस्यादाय सर्वेषां कृष्णा वचनमब्रवीत् ।
शालवृक्षके समान कंधे और जाँघोंसे सुशोभित वीर अर्जुनको इस प्रकार सबके चित्तको चुराकर प्रस्थान करते देख द्रौपदी इस प्रकार बोली ।। २३ १/२ ।।

कृष्णोवाच

यत् ते कुन्ती महाबाहो जातस्यैच्छद् धनंजय ।। २४ ।।
तत् तेऽस्तु सर्वं कौन्तेय यथा च स्वयमिच्छसि ।
द्रौपदीने कहा—कुन्तीकुमार महाबाहु धनंजय! आपके जन्म लेनेके समय आर्या कुन्तीने अपने मनमें आपके लिये जो-जो इच्छाएँ की थीं तथा आप स्वयं भी अपने हृदयमें जो-जो मनोरथ रखते हों, वे सब आपको प्राप्त हों ।। २४ १/२ ।।
मास्माकं क्षत्रियकुले जन्म कश्चिदवाप्नुयात् ।। २५ ।।
ब्राह्मणेभ्यो नमो नित्यं येषां भैक्ष्येण जीविका ।
हमलोगोंमेंसे कोई भी क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न न हो। उन ब्राह्मणोंको नमस्कार है, जिनका भिक्षासे ही निर्वाह हो जाता है ।। २५ १/२ ।।
इदं मे परमं दुःखं यः स पापः सुयोधनः ।। २६ ।।
दृष्ट्वा मां गौरिति प्राह प्रहसन् राजसंसदि ।
नाथ! मुझे सबसे बढ़कर दुःख इस बातसे हुआ है कि उस पापी दुर्योधनने राजाओंसे भरी हुई सभामें मेरी ओर देखकर और मुझे 'गाय' (अनेक पुरुषोंके उपभोगमें आनेवाली) कहकर मेरा उपहास किया ।। २६ १/२ ।।
तस्माद् दुःखादिदं दुःखं गरीय इति मे मतिः ।। २७ ।।
यत् तत् परिषदो मध्ये बह्वयुक्तमभाषत ।
उस दुःखसे भी बढ़कर महान् कष्ट मुझे इस बातसे हुआ कि उसने भरी सभामें मेरे प्रति बहुत-सी अनुचित बातें कहीं ।। २७ १/२ ।।
नूनं ते भ्रातरः सर्वे त्वत्कथाभिः प्रजागरे ।। २८ ।।
रंस्यन्ते वीर कर्माणि कथयन्तः पुनः पुनः ।
नैव नः पार्थ भोगेषु न धने नोत जीविते ।। २९ ।।
तुष्टिर्बुद्धिर्भवित्री वा त्वयि दीर्घप्रवासिनि ।
त्वयि नः पार्थ सर्वेषां सुखदुःखे समाहिते ।। ३० ।।
जीवितं मरणं चैव राज्यमैश्वर्यमेव च ।