महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोनों पाण्डवोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास वहाँ आ पहुँचे ।। २२ ।। सोऽभिगम्य यथान्यायं पाण्डवैः प्रतिपूजितः । युधिष्ठिरमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ।। २३ ।। पाण्डवोंने उठकर उनकी अगवानी की और यथायोग्य पूजन किया। तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ।। २३ ।।
व्यास उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो वेद्मि ते हृदयस्थितम् । मनीषया ततः क्षिप्रमागतोऽस्मि नरर्षभ ।। २४ ।। **व्यासजीने कहा—**नरश्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मैं ध्यानके द्वारा तुम्हारे मनका भाव जान चुका हूँ। इसलिये शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ ।। २४ ।। भीष्माद् द्रोणात् कृपात् कर्णाद् द्रोणपुत्राच्च भारत । दुर्योधनान्नृपसुतात् तथा दुःशासनादपि ।। २५ ।। यत् ते भयममित्रघ्न हृदि सम्परिवर्तते । तत् तेऽहं नाशयिष्यामि विधिदृष्टेन कर्मणा ।। २६ ।। शत्रुहन्ता भारत! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और दुःशासनसे भी जो तुम्हारे मनमें भय समा गया है, उसे मैं शास्त्रीय उपायसे नष्ट कर दूँगा ।। २५-२६ ।। तच्छ्रुत्वा धृतिमास्थाय कर्मणा प्रतिपादय । प्रतिपाद्य तु राजेन्द्र ततः क्षिप्रं ज्वरं जहि ।। २७ ।। राजेन्द्र! उस उपायको सुनकर धैर्यपूर्वक प्रयत्नद्वारा उसका अनुष्ठान करो। उसका अनुष्ठान करके शीघ्र ही अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो ।। २७ ।। तत एकान्तमुन्नीय पाराशर्यो युधिष्ठिरम् । अब्रवीदुपपन्नार्थमिदं वाक्यविशारदः ।। २८ ।। तदनन्तर प्रवचनकुशल पराशरनन्दन व्यासजी युधिष्ठिरको एकान्तमें ले गये और उनसे यह युक्तियुक्त वचन बोले— ।। २८ ।। श्रेयसस्ते परः कालः प्राप्तो भरतसत्तम । येनाभिभविता शत्रून् रणे पार्थो धनुर्धरः ।। २९ ।। ‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे कल्याणका सर्वश्रेष्ठ समय आया है, जिससे धनुर्धर अर्जुन युद्धमें शत्रुओंको पराजित कर देंगे ।। २९ ।। गृहाणेमां मया प्रोक्तां सिद्धिं मूर्तिमतीमिव । विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते ।। ३० ।।