महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्रोणस्य च महाबाहो कृपस्य च महात्मनः ।। १५ ।। अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मतिः । तस्मात् त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ।। १६ ।। महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा महामना कृपाचार्यका आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा हमलोगोंपर एक-सा ही है, तथापि वे राजा दुर्योधनका दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः उसका ऋण अवश्य चुकायेंगे, ऐसा मुझे प्रतीत होता है। युद्ध छिड़नेपर वे भी दुर्योधनके पक्षसे ही लड़कर अपने दुस्त्यज प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे ।। १५-१६ ।। सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः । अजेयाश्चेति मे बुद्धिरपि देवैः सवासवैः ।। १७ ।। वे सब-के-सब दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और धर्मपरायण हैं। मेरी बुद्धिमें तो यहाँतक आता है कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते ।। १७ ।। अमर्षी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथः । सर्वास्त्रविदनाधृष्यो ह्यभेद्यकवचावृतः ।। १८ ।। उस पक्षमें महारथी कर्ण भी है, जो हमारे प्रति सदा अमर्ष और क्रोधसे भरा रहता है। वह सब अस्त्रोंका ज्ञाता, अजेय तथा अभेद्य कवचसे सुरक्षित है ।। १८ ।। अनिर्जित्य रणे सर्वानैतान् पुरुषसत्तमान् । अशक्यो ह्यसहायेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वया ।। १९ ।। इन समस्त वीर पुरुषोंको युद्धमें परास्त किये बिना तुम अकेले दुर्योधनको नहीं मार सकते ।। १९ ।। न निद्रामधिगच्छामि चिन्तयानो वृकोदर । अतिसर्वान् धनुर्ग्राहान् सूतपुत्रस्य लाघवम् ।। २० ।। वृकोदर! सूतपुत्र कर्णके हाथोंकी फुर्ती समस्त धनुर्धरोंसे बढ़-चढ़कर है। उसका स्मरण करके मुझे अच्छी तरह नींद नहीं आती है ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
एतद् वचनमाज्ञाय भीमसेनोऽत्यमर्षणः । बभूव विमनास्त्रस्तो न चैवोवाच किंचन ।। २१ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अत्यन्त क्रोधी भीमसेन उदास और शंकायुक्त हो गये। फिर उनके मुँहसे कोई बात नहीं निकली ।। २१ ।। तयोः संवदतोरेवं तदा पाण्डवयोर्द्वयोः । आजगाम महायोगी व्यासः सत्यवतीसुतः ।। २२ ।।