महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 451, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः ॥ ३२ ॥ वह वनका राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है, इसके चार दाढ़ें और विशाल थोड़ी है। मैं निःशंक होकर इसके सामने जा रही हूँ और कहती हूँ, 'आप मृगोंके राजा और इस वनके स्वामी हैं ॥ ३१-३२ ॥
विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम् । निषधाधिपतेर्भार्या नलस्यामित्रघातिनः ॥ ३३ ॥ 'मैं विदर्भराजकुमारी दमयन्ती हूँ। मुझे शत्रुघाती निषधनरेश नलकी पत्नी समझिये ॥ ३३ ॥
पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम् । आश्वासय मृगेन्द्रह यदि दृष्टस्त्वया नलः ॥ ३४ ॥ 'मृगेन्द्र! मैं इस वनमें अकेली पतिकी खोजमें भटक रही हूँ तथा शोकसे पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ। यदि आपने नलको यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल-समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३४ ॥
अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि । मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद् विमोचय ॥ ३५ ॥ 'अथवा वनराज मृगश्रेष्ठ! यदि आप नलके विषयमें कुछ नहीं बताते हैं तो मुझे खा जायँ और इस दुःखसे छुटकारा दे दें' ॥ ३५ ॥
श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम् । यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥ ३६ ॥ अहो! इस घोर वनमें मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सान्त्वना नहीं देता। यह तो स्वादिष्ट जलसे भरी हुई इस समुद्रगामिनी नदीकी ओर जा रहा है ॥
इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः । विराजद्भिरिवानेकैरनेकवर्णैर्मनोरमैः ॥ ३७ ॥ अच्छा, इस पवित्र पर्वतसे ही पूछती हूँ। यह बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शोभाशाली बहुरंगे एवं मनोरम शिखरोंद्वारा सुशोभित है ॥ ३७ ॥
नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् । अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोत्थितम् ॥ ३८ ॥ अनेक प्रकारके धातुओंसे व्याप्त और भाँति-भाँतिके शिला-खण्डोंसे विभूषित है। यह पर्वत इस महान् वनकी ऊपर उठी हुई पताकाके समान जान पड़ता है ॥ ३८ ॥
सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगायुतम् । पतत्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥ ३९ ॥ यह सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और मृगोंसे परिपूर्ण है। इसके चारों ओर अनेक प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं ॥ ३९ ॥