भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 452

किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् । कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥ ४० ॥ पलाश, अशोक, बकुल, पुन्नाग, कनेर, धव तथा प्लक्ष आदि सुन्दर फूलोंवाले वृक्षोंसे वह पर्वत सुशोभित हो रहा है ॥ ४० ॥ सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम् । गिरिराजमिमं तावत् पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥ ४१ ॥ यह पर्वत अनेक सरिताओं, सुन्दर पक्षियों और शिखरोंसे परिपूर्ण है। अब मैं इसी गिरिराजसे महाराज नलका समाचार पूछती हूँ ॥ ४१ ॥ भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत । शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥ ४२ ॥ ‘भगवन्! अचलप्रवर! दिव्य दृष्टिवाले! विख्यात! सबको शरण देनेवाले परम कल्याणमय महीधर! आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥ प्रणमाम्यभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम् । राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥ ४३ ॥ ‘मैं निकट आकर आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। आप मेरा परिचय इस प्रकार जानें, मैं राजाकी पुत्री, राजाकी पुत्रवधू तथा राजाकी ही पत्नी हूँ। मेरी ‘दमयन्ती’ नामसे प्रसिद्धि है ॥ ४३ ॥ राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः । भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥ ४४ ॥ ‘विदर्भदेशके स्वामी महारथी भीम नामक राजा मेरे पिता हैं। वे पृथ्वीके पालक तथा चारों वर्णोंके रक्षक हैं ॥ ४४ ॥ राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् । आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ४५ ॥ ‘उन्होंने (प्रचुर) दक्षिणावाले राजसूय तथा अश्वमेध नामक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। वे भूमिपालोंमें श्रेष्ठ हैं। उनके नेत्र बड़े, चंचल और सुन्दर हैं ॥ ४५ ॥ ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः । शीलवान् वीर्यसम्पन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥ ४६ ॥ ‘वे ब्राह्मणभक्त, सदाचारी, सत्यवादी, किसीके दोषको न देखनेवाले, शीलवान्, पराक्रमी, प्रचुर सम्पत्तिके स्वामी, धर्मज्ञ तथा पवित्र हैं ॥ ४६ ॥ सम्यग् गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः । तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥ ४७ ॥ ‘वे विदर्भदेशकी जनताका अच्छी तरह पालन करनेवाले हैं। उन्होंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, वे बड़े शक्तिशाली हैं। भगवन्! मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। मैं आपकी सेवामें