भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 453

(एक जिज्ञासा लेकर) उपस्थित हुई हूँ॥ ४७॥ निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः। गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह॥ ४८॥ 'निषधदेशके महाराज मेरे श्वशुर थे, वे प्रातः-स्मरणीय नरश्रेष्ठ वीरसेनके नामसे विख्यात थे॥ ४८॥ तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान् सत्यपराक्रमः। क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह॥ ४९॥ 'उन्हीं महाराज वीरसेनके एक वीर पुत्र हैं, जो बड़े ही सुन्दर और सत्यपराक्रमी हैं। वे वंशपरम्परासे प्राप्त अपने पिताके राज्यका पालन करते हैं॥ ४९॥ नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः। ब्रह्मण्यो वेदविद् वाग्मी पुण्यकृत् सोमपोऽग्निमान् ॥ ५० ॥ 'उनका नाम नल है। शत्रुदमन, श्यामसुन्दर राजा नल पुण्यश्लोक कहे जाते हैं। वे बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, वक्ता, पुण्यात्मा, सोमपान करनेवाले और अग्निहोत्री हैं॥ ५०॥ यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक् चैव प्रशासिता। तस्य मामबलां श्रेष्ठां विद्धि भार्यामिहागताम्॥ ५१॥ त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम्। अन्वेषमाणां भर्तारं त्वं मां पर्वतसत्तम॥ ५२॥ 'वे एक अच्छे यज्ञकर्ता, उत्तम दाता, शूरवीर योद्धा और श्रेष्ठ शासक हैं, आप मुझे उन्हींकी श्रेष्ठ पत्नी समझ लीजिये। मैं अबला नारी आपके निकट यहाँ उन्हींकी कुशल पूछनेके लिये आयी हूँ। गिरिराज! (मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं चले गये हैं।) मैं धन-सम्पत्तिसे वंचित, पतिदेवसे रहित, अनाथ और संकटोंकी मारी हुई हूँ। इस वनमें अपने पतिकी ही खोज कर रही हूँ॥ ५१-५२॥ समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः। कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः॥ ५३॥ 'पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरोंद्वारा इस भयानक वनमें कहीं राजा नलको देखा है? ॥ ५३ ॥ गजेन्द्रविक्रमो धीमान् दीर्घबाहुरमर्षणः। विक्रान्तः सत्त्ववान् वीरो भर्ता मम महायशाः॥ ५४॥ निषधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः। विलपतीं किमेकां मां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम्॥ ५५॥ गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम्।

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