महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'मेरे महायशस्वी स्वामी निषधराज नल गजराजकी-सी चालसे चलते हैं। वे बड़े बुद्धिमान्, महाबाहु, अमर्षशील (दुःखको न सह सकनेवाले), पराक्रमी, धैर्यवान् तथा वीर हैं। क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? गिरिश्रेष्ठ! मैं आपकी पुत्रीके समान हूँ और (पतिके वियोगसे बहुत ही) दुःखी हूँ। क्या आप व्याकुल होकर अकेली विलाप करती हुई मुझ अबलाको आज अपनी वाणीद्वारा आश्वासन न देंगे?' ।। ५४-५५१/२ ।।
वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते ।। ५६ ।।
यद्यस्यस्मिन् वने राजन् दर्शयात्मानमात्मना ।
वीर! धर्मज्ञ! सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रमी महीपाल! यदि आप इसी वनमें हैं तो राजन्! अपने-आपको प्रकट करके मुझे दर्शन दीजिये ।। ५६१/२ ।।
कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् ।। ५७ ।।
श्रोश्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् ।
वैदर्भरीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ।। ५८ ।।
आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् ।
मैं कब निषधराज नलकी मेघ-गर्जनाके समान स्निग्ध, गम्भीर, अमृतोपम वह मधुर वाणी सुनूँगी। उन महामना राजाके मुखसे 'वैदर्भि!' इस सम्बोधनसे युक्त शुभ, स्पष्ट, वेदके अनुकूल, सुन्दर पद और अर्थसे युक्त तथा मेरे शोकका विनाश करनेवाली वाणी मुझे कब सुनायी देगी ।। ५७-५८१/२ ।।
भीतामाश्वासयत मां नृपते धर्मवत्सल ।। ५९ ।।
धर्मवत्सल नरेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको आश्वासन दीजिये ।। ५९ ।।
इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी ।
दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ।। ६० ।।
इस प्रकार उस श्रेष्ठ पर्वतसे कहकर वह राजकुमारी दमयन्ती फिर वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर चल दी ।। ६० ।।
सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना ।
तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ।। ६१ ।।
लगातार तीन दिन और तीन रात चलनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नारीने तपस्वियोंसे युक्त एक वन देखा, जो अनुपम तथा दिव्य वनसे सुशोभित था ।। ६१ ।।
वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् ।
नियतैः संयताहारैर्दमशौचसमन्वितैः ।। ६२ ।।
तथा वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान नियम-परायण, मिताहारी तथा (शम,) दम, शौच आदिसे सम्पन्न तपस्वियोंसे वह शोभायमान हो रहा था ।। ६२ ।।
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च ।
जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ।। ६३ ।।