महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयच्चोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप । मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि ॥ १६ ॥ भूमिपाल! आकाशचारी हंसोंने आपके समीप तथा मेरे सामने जो बातें कही थीं, उनपर विचार कीजिये ॥ १६ ॥ चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः । स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥ १७ ॥ नरसिंह! एक ओर अंग और उपांगोंसहित विस्तारपूर्वक चारों वेदोंका स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्यभाषण हो तो वह निश्चय ही उससे बढ़कर है ॥ १७ ॥ तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर । उक्तवानसि यद् वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥ १८ ॥ अतः शत्रुहन्ता नरेश्वर! वीर! आपने पहले मेरे समीप जो बातें कही हैं, उन्हें सत्य करना चाहिये ॥ १८ ॥ हा वीर नल नामाहं नष्टा किल तवानघ । अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ १९ ॥ हा निष्पाप वीर नल! आपकी मैं दमयन्ती इस भयंकर वनमें नष्ट हो रही हूँ, आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ १९ ॥ कर्षयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः । अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥ २० ॥ यह भयानक आकृतिवाला क्रूर सिंह भूखसे पीड़ित हो मुँह बाये खड़ा है और मुझपर आक्रमण करना चाहता है, क्या आप मेरी रक्षा नहीं कर सकते? ॥ २० ॥ न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियास्तीत्यब्रवीः सदा । तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥ २१ ॥ कल्याणमय नरेश! आप पहले जो सदा यह कहते थे कि तुम्हारे सिवा दूसरी कोई भी स्त्री मुझे प्रिय नहीं है, अपनी उस बातको सत्य कीजिये ॥ २१ ॥ उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप । ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २२ ॥ महाराज! मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ और आप मेरे प्रियतम पति हैं, ऐसी दशामें भी मैं यहाँ उन्मत्त विलाप कर रही हूँ तो भी आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ २२ ॥ कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप । वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥ २३ ॥ यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन । न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥ २४ ॥