भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 448

कितनी ही नदियों, सरोवरों, बावलियों तथा नाना प्रकारके मृगों और पक्षियोंको देखा। उसने बहुत-से भयानक रूपवाले पिशाच, नाग तथा राक्षस देखे। कितने ही गड्ढों, पोखरों और पर्वतशिखरोंका अवलोकन किया। सरिताओं और अद्भुत झरनोंको देखा ॥ ७-८ ॥

यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी ।
महिषांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान् ॥ ९ ॥
तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता ।
वैदर्भी विचरत्येका नलमान्वेषती तदा ॥ १० ॥
विदर्भराजनन्दिनीने उस वनमें झुंड-के-झुंड भैंसे, सूअर, रीछ और जंगली साँप देखे। तेज, यश, शोभा और परम धैर्यसे युक्त विदर्भकुमारी उस समय अकेली विचरती और नलको ढूँढ़ती थी ॥ ९-१० ॥

नाबिभ्यत् सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित् ।
दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता ॥ ११ ॥
वह पतिके विरहरूपी संकटसे संतप्त थी। अतः राजकुमारी दमयन्ती उस भयंकर वनमें प्रवेश करके भी किसी जीव-जन्तुसे भयभीत नहीं हुई ॥ ११ ॥

विदर्भतनया राजन् विललाप सुदुःखिता ।
भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥ १२ ॥
राजन्! विदर्भकुमारी दमयन्तीके अंग-अंगमें पतिके वियोगका शोक व्याप्त हो गया था, इसलिये वह अत्यन्त दुःखित हो एक शिलाके नीचे भागमें बैठकर बहुत विलाप करने लगी— ॥ १२ ॥

दमयन्त्युवाच

व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप ।
क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने ॥ १३ ॥
अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥ १४ ॥
दमयन्ती बोली—चौड़ी छातीवाले महाबाहु निषधनरेश महाराज! आज इस निर्जन वनमें (मुझ अकेलीको) छोड़कर आप कहाँ चले गये? नरश्रेष्ठ! वीरशिरोमणे! प्रचुर दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी आप मेरे साथ मिथ्या बर्ताव क्यों कर रहे हैं? ॥ १३-१४ ॥

यत् त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ तत् समक्षं महाद्युते ।
स्मर्तुमर्हसि कल्याण वचनं पार्थिवर्षभ ॥ १५ ॥
महातेजस्वी कल्याणमय राजाओंमें उत्तम नरश्रेष्ठ! आपने मेरे सामने जो बात कही थी, अपनी उस बातका स्मरण करना उचित है ॥ १५ ॥