महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरश्रेष्ठ! राजा जनक सदा स्वधर्ममें तत्पर रहनेवाली सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह रखते हुए उसका पिताकी भाँति सदा पालन करते हैं। जो लोग मेरी प्रशंसा करते हैं और जो निन्दा करते हैं, उन सबको अपने सद्व्यवहारसे संतुष्ट रखता हूँ ।। ३८ ।।
ये जीवन्ति स्वधर्मेण संयुज्जन्ति च पार्थिवाः ।। ३९ ।।
न किंचिदुपजीवन्ति दान्ता उत्थानशीलिनः ।
जो राजा अपने धर्मका पालन करते हुए जीवन-निर्वाह करते हैं, धर्ममें ही संयुक्त रहते हैं, किसी दूसरेकी कोई वस्तु अपने उपयोगमें नहीं लाते तथा सदा अपनी इन्द्रियोंपर संयम रखते हैं, वे ही उन्नतिशील होते हैं ।। ३९ १/२ ।।
शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षा धर्मनित्यता ।। ४० ।।
यथार्हं प्रति पूजा च सर्वभूतेषु वै सदा ।
त्यागान्नान्यत्र मर्त्यानां गुणास्तिष्ठन्ति पूरुषे ।। ४१ ।।
अपनी शक्तिके अनुसार सदा दूसरोंको अन्न देना, दूसरोंके अपराध तथा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंको सहन करना, सदा धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगे रहना तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें सभी पूजनीय पुरुषोंका यथायोग्य पूजन करना—ये मनुष्योंके सद्गुण पुरुषमें स्वार्थत्यागके बिना नहीं रह पाते हैं ।। ४०-४१ ।।
मृषा वादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ।। ४२ ।।
झूठ बोलना छोड़ दे, बिना कहे ही दूसरोंका प्रिय करे, काम, क्रोध तथा द्वेषसे भी कभी धर्मका परित्याग न करे ।। ४२ ।।
प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।
न मुह्येदर्थकृच्छ्रेषु न च धर्मं परित्यजेत् ।। ४३ ।।
प्रिय वस्तुकी प्राप्ति होनेपर हर्षसे फूल न उठे, अपने मनके विपरीत कोई बात हो जाय तो दुःख न माने—चिन्तित न हो, अर्थसंकट आ जाय तो भी मोहके वशीभूत हो घबराये नहीं और किसीभी अवस्थामें अपना धर्म न छोड़े ।। ४३ ।।
कर्म चेत्किंचिदन्यत् स्यादितरन्न तदाचरेत् ।
यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत् ।। ४४ ।।
यदि भूलसे कभी कोई निन्दित कर्म बन जाय तो फिर दुबारा वैसा काम न करे। अपने मन और बुद्धिसे विचार करनेपर जो कल्याणकारी प्रतीत हो, उसी कार्यमें अपनेको लगावे ।। ४४ ।।
न पापे प्रतिपापः स्यात् साधुरेव सदा भवेत् ।
आत्मनैव हतः पापो यः पापं कर्तुमिच्छति ।। ४५ ।।
यदि कोई अपने साथ बुरा बर्ताव करे तो स्वयं भी बदलेमें उसके साथ बुराई न करे। सबके साथ सदा सद्व्यवहार ही करे। जो पापी दूसरोंका अहित करना चाहता है वह स्वयं