भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1441

ही नष्ट हो जाता है ॥ ४५ ॥ कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत् । न धर्मोऽस्तीति मन्वानाः शुचीनवहसन्ति ये ॥ ४६ ॥ अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशयः । महादृतिरिवाध्मातः पापो भवति नित्यदा ॥ ४७ ॥ यह (दूसरोंका अहित करना) तो दुराचारीकी भाँति दुर्व्यसनोंमें आसक्त हुए पापी पुरुषोंका ही कार्य है। 'धर्म कोई चीज नहीं है' ऐसा मानकर जो शुद्ध आचार-विचारवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी हँसी उड़ाते हैं, वे धर्मपर अश्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। पापी मनुष्य लुहारकी बड़ी धौंकनीके समान सदा ऊपरसे फूले दिखायी देते हैं (परंतु वास्तवमें सारहीन होते हैं) ॥ ४६-४७ ॥ (साधुः सन्नतिमानेव सर्वत्र द्विजसत्तम ।) मूढानामवलिप्तानामसारं भावितं भवेत् । दर्शयत्यन्तरात्मा तं दिवा रूपमिवांशुमान् ॥ ४८ ॥ द्विजश्रेष्ठ! उत्तम पुरुष सर्वत्र विनयशील ही होता है। अहंकारी मूढ़ मनुष्योंकी सोची हुई प्रत्येक बात निःसार होती है। जैसे सूर्य दिनके रूपको प्रकट कर देता है, उसी प्रकार मूर्खोंकी अन्तरात्मा ही उनके यथार्थ स्वरूपका दर्शन करा देती है ॥ ४८ ॥ न लोके राजते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया । अपि चेह श्रिया हीनः कृतविद्यः प्रकाशते ॥ ४९ ॥ मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसाके बलसे जगत्-में प्रतिष्ठा नहीं पाता है, विद्वान् पुरुष कान्तिहीन हो तो भी संसारमें उसकी ख्याति बढ़ जाती है ॥ ४९ ॥ अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन् । न कश्चिद् गुणसम्पन्नः प्रकाशो भुवि दृश्यते ॥ ५० ॥ किसी दूसरेकी निन्दा न करे, अपनी मान-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा न करे, कोई भी गुणवान् पुरुष पर निन्दा और आत्मप्रशंसाका त्याग किये बिना इस भूमण्डलमें सम्मानित हुआ हो, यह नहीं देखा जाता है ॥ ५० ॥ विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते । न तत् कुर्यां पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥ ५१ ॥ जो मनुष्य पापकर्म बन जानेपर सच्चे हृदयसे पश्चात्ताप करता है, वह उस पापसे छूट जाता है तथा 'फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूँगा' ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेनेपर वह भविष्यमें होनेवाले दूसरे पापसे भी बच जाता है ॥ ५१ ॥ कर्मणा येन तेनेह पापाद् द्विजवरोत्तम । एवं श्रुतिरियं ब्रह्मन् धर्मेषु प्रतिदृश्यते ॥ ५२ ॥