भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1154

उस समय बहुत-से देवर्षि तथा अन्य महर्षि एवं ब्रह्मर्षि और सिद्धगण उस महायुद्धमें (देखनेके लिये) आये। वे सब-के-सब मेरी विजय चाहते थे। अतः उन्होंने जैसे तारकामय संग्रामके अवसरपर इन्द्रकी स्तुति की थी, उसी प्रकार अनुकूल एवं मधुर वचनोंद्वारा मेरा भी स्तवन किया ।। २३-२४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि युद्धारम्भे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें युद्धारम्भविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६९ ।।


१. एक विशेष प्रकारके मत्स्यका नाम ‘तिमि’ है, जो उसे निगल जाता है, उस महामत्स्यको ‘तिमिगिल’ कहते हैं। २. जो तिमिंगलको भी निगल जाता है, उस महामहामत्स्यका नाम ‘तिमितिमिंगिल’ है। ३. नीलकण्ठी टीकामें लिखा है कि पृथ्वीमें उतरकर निम्नस्थलमें गये हुए रथके चक्केको दृढ़तापूर्वक पकड़कर ऊँचा किया।