भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1153

प्रगृहीतैर्दितेः पुत्राः प्रादुरासन् सहस्रशः ॥ १६ ॥ भारत! तदनन्तर निवातकवचनामक सभी दैत्य आभूषणोंसे विभूषित हो भाँति-भाँतिके कवच धारण किये, हाथोंमें विचित्र आयुध लिये, लोहेके बने हुए बड़े-बड़े शूल, गदा, मुसल, पट्टिश, करवाल, रथ-चक्र, शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि (बंदूक) तथा रत्नजटित विचित्र खड्ग आदि लेकर सहस्रोंकी संख्यामें नगरसे बाहर आये ॥ १४—१६ ॥

ततो विचार्य बहुशो रथमार्गेषु तान् हयान् । प्राचोदयत् समे देशो मातलिर्भरतर्षभ ॥ १७ ॥ तेन तेषां प्रणुन्नानामाशुत्वाच्छीघ्रगामिनाम् । नान्वपश्यं तदा किंचित् तन्मेऽद्भुतमिवाभवत् ॥ १८ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय मातलिने बहुत सोच-विचारकर समतल प्रदेशमें रथ जानेयोग्य मार्गोंपर अपने उन घोड़ोंको हाँका। उसके हाँकनेपर उन शीघ्रगामी अश्वोंकी चाल इतनी तेज हो गयी कि मुझे उस समय कुछ भी दिखायी नहीं देता था। यह एक अद्भुत बात थी ॥

ततस्ते दानवास्तत्र वादित्राणि सहस्रशः । विकृतस्वररूपाणि भृशं सर्वाण्यनादयन् ॥ १९ ॥ तदनन्तर उन दानवोंने वहाँ भीषण स्वर और विकराल आकृतिवाले विभिन्न प्रकारके सहस्रों बाजे जोर-जोरसे बजाने आरम्भ किये ॥ १९ ॥

तेन शब्देन सहसा समुद्रे पर्वतोपमाः । आप्लवन्त गतैः सत्त्वैर्मत्स्याः शतसहस्रशः ॥ २० ॥ वाद्योंकी उस तुमुल-ध्वनिसे सहसा समुद्रके लाखों बड़े-बड़े पर्वताकार मत्स्य मर गये और उनकी लाशें पानीके ऊपर तैरने लगीं ॥ २० ॥

ततो वेगेन महता दानवा मामुपाद्रवन् । विमुञ्चन्तः शितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् उन सब दानवोंने सैकड़ों और हजारों तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े वेगसे मुझपर आक्रमण किया ॥ २१ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषां च मम भारत । अवर्तत महाघोरो निवातकवचान्तकः ॥ २२ ॥ भारत! तब उन दानवोंका और मेरा महाभयंकर तुमुल संग्राम आरम्भ हो गया, जो निवातकवचोंके लिये विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥

ततो देवर्षयश्चैव तथान्ये च महर्षयः । ब्रह्मर्षयश्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे ॥ २३ ॥ ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जयैषिणः । अस्तुवन् मुनयो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामये ॥ २४ ॥