महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1146, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंविश्वावसोश्च वै पुत्रश्चित्रसेनोऽभवत् सखा ॥ ५७ ॥ इतना ही नहीं, उन्होंने बड़े आदरके साथ मेरे अंगोंपर हाथ फेरा। यज्ञोंमें पूरी दक्षिणा देनेवाले भरतश्रेष्ठ! उस स्वर्गलोकमें देवताओं और गन्धर्वोंके साथ अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये रहने लगा और प्रतिदिन अस्त्रोंका अभ्यास करने लगा। उस समय गन्धर्वराज विश्वावसुके पुत्र चित्रसेनके साथ मेरी मैत्री हो गयी थी ॥ ५६-५७ ॥
स च गान्धर्वमखिलं ग्राहयामास मां नृप ।
तत्राहमवसं राजन् गृहीतास्त्रः सुपूजितः ॥ ५८ ॥
सुखं शक्रस्य भवने सर्वकामसमन्वितः ।
शृण्वन् वै गीतशब्दं च तूर्यशब्दं च पुष्कलम् ।
पश्यंश्चाप्सरसः श्रेष्ठा नृत्यन्तीर्भरतर्षभ ॥ ५९ ॥
नरेश्वर! उन्होंने मुझे सम्पूर्ण गान्धर्ववेद (संगीत-विद्या)-का अध्ययन कराया। राजन्! वहाँ इन्द्रभवनमें अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण करते हुए मैं बड़े सम्मान और सुखसे रहने लगा। वहाँ सभी मनोवांछित पदार्थ मेरे लिये सुलभ थे। भरतश्रेष्ठ! मैं वहाँ कभी मनोहर गीत सुनता, कभी पर्याप्तरूपसे दिव्य वाद्योंका आनन्द लेता और कभी-कभी श्रेष्ठ अप्सराओंका नृत्य भी देख लेता था ॥
तत् सर्वमनवज्ञाय तथ्यं विज्ञाय भारत ।
अत्यर्थं प्रतिगृह्याहमस्त्रेष्वेव व्यवस्थितः ॥ ६० ॥
भारत! इन समस्त सुख-सुविधाओंकी अवहेलना न करते हुए उन्हें स्वीकार करके भी मैं इनके असली रूपको जानकर—इनकी निःसारताको भलीभाँति समझकर अधिकतर अस्त्रोंके अभ्यासमें ही संलग्न रहता था। (गीत आदिमें कभी आसक्त नहीं हुआ) ॥ ६० ॥
ततोऽतुष्यत् सहस्राक्षस्तेन कामेन मे विभुः ।
एवं मे वसतो राजन्नेष कालोत्यगाद् दिवि ॥ ६१ ॥
अस्त्रविद्याकी ओर मेरी ऐसी अभिरुचि होनेसे सहस्रनेत्रधारी भगवान् इन्द्र मुझपर बहुत संतुष्ट रहते थे। राजन्! इस प्रकार स्वर्गमें रहकर मेरा यह समय सुखपूर्वक बीतने लगा ॥ ६१ ॥
कृतास्त्रमतिविश्वस्तमथ मां हरिवाहनः ।
संस्पृश्य मूर्ध्नि पाणिभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६२ ॥
धीरे-धीरे मैं अस्त्रविद्यामें निपुण हो गया। मेरी विज्ञतापर सबको अधिक विश्वास था। एक दिन भगवान् इन्द्रने अपने दोनों हाथोंसे मेरे मस्तकका स्पर्श करते हुए मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ६२ ॥
न त्वमद्य युधा जेतुं शक्यः सुरगणैरपि ।
किं पुनर्मानुषे लोके मानुषैरकृतात्मभिः ॥ ६३ ॥