महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना
अर्जुन उवाच
ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम्
देवराजो विगृह्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
अर्जुन कहते हैं—राजन्! तदनन्तर मैं देवराजका अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया। धीरे-धीरे मेरे शरीरके सब घाव भर गये। तब एक दिन देवराज इन्द्रने मेरा हाथ पकड़कर कहा— ॥ १ ॥
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत
न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ॥ २ ॥
‘भरतनन्दन! तुममें सब दिव्यास्त्र विद्यमान हैं। भूमण्डलका कोई भी मनुष्य तुम्हें पराजित नहीं कर सकता ॥ २ ॥
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः
संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३ ॥
‘बेटा! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा राजाओंसहित शकुनि—ये सब-के-सब संग्राममें खड़े होनेपर तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते’ ॥ ३ ॥
इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभुः
अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम् ॥ ४ ॥
महाराज! उन देवेश्वर इन्द्रने स्वयं मेरे शरीरकी रक्षा करनेवाला यह अभेद्य दिव्य कवच और यह सुवर्णमयी माला मुझे दी ॥ ४ ॥
देवदत्तं च मे शङ्खं पुनः प्रादान्महारवम्
दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह ॥ ५ ॥
फिर उन्होंने बड़े जोरकी आवाज करनेवाला यह देवदत्त नामक शंख प्रदान किया। स्वयं देवराज इन्द्रने ही यह दिव्य किरीट मेरे मस्तकपर रखा था ॥ ५ ॥
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च
प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवराजने मुझे ये मनोहर एवं विशाल दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण दिये ॥ ६ ॥