भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1182, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1182

एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ॥ ७ ॥ महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ७ ॥

ततो मामब्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह समयोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ॥ ८ ॥ तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'अर्जुन! अब तुम्हारे जानेका समय आ गया है; क्योंकि तुम्हारे भाई तुम्हें बहुत याद करते हैं' ॥ ८ ॥

एवमिन्द्रस्य भवने पञ्च वर्षाणि भारत उषितानि मया राजन् स्मरता द्यूतजं कलिम् ॥ ९ ॥ भारत! इस प्रकार द्यूतजनित कलहका स्मरण करते हुए मैंने इन्द्रभवनमें पाँच वर्ष व्यतीत किये हैं ॥ ९ ॥

ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितम् गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ॥ १० ॥ इसके बाद इस गन्धमादनकी शाखाभूत इस पर्वतके शिखरपर भाइयोंसहित आपका दर्शन किया है ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ॥ ११ ॥ दिष्ट्या च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप साक्षाद् दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ ॥ १२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। भारत! यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुमने देवताओंके स्वामी राजराजेश्वर इन्द्रको आराधनाद्वारा प्रसन्न कर लिया। निष्पाप परंतप! सबसे बड़ी सौभाग्यकी बात तो यह है कि तुमने देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् शंकरका दर्शन किया और उन्हें अपनी युद्धकलासे संतुष्ट कर लिया ॥ ११-१२ ॥

दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागतः ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! समस्त लोकपालोंके साथ तुम्हारी भेंट हुई, यह भी हमारे लिये सौभाग्यका सूचक है। हमारा अहोभाग्य है कि हम उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहे हैं। अर्जुन! हमारे भाग्यसे ही तुम पुनः हमारे पास लौट आये ॥ १३ ॥

अद्य कृत्स्नां महीं देवीं विजितां पुरमालिनीम्

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 1182, कुल 2580 में से · BharatKosha