भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1183

मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ॥ १४ ॥
आज मुझे यह विश्वास हो गया कि हम नगरोंसे सुशोभित समूची वसुधादेवीको जीत लेंगे। अब हम धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भी अपने वशमें पड़ा हुआ ही मानते हैं ॥ १४ ॥
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टुं दिव्यानि भारत
यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवीतकवचा हतः ॥ १५ ॥
भारत! अब मेरी इच्छा उन दिव्यास्त्रोंको देखनेकी हो रही है, जिनके द्वारा तुमने उस प्रकारके उन महापराक्रमी निवातकवचोंका विनाश किया है ॥ १५ ॥

अर्जुन उवाच
श्वः प्रभाते भवान् द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः
निवातकवचा घोरा यैर्मया विनिपातिताः ॥ १६ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! कल सबेरे आप उन सब दिव्यास्त्रोंको देखियेगा जिनके द्वारा मैंने भयानक निवातकवचोंको मार गिराया है ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजयः
भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने आगमनका वृत्तान्त सुनाकर सब भाइयोंसहित अर्जुनने वहाँ वह रात व्यतीत की ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनके लिये संकेतविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥