महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1211, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमद्दिनाशात् परिद्यूनाविति मे वर्तते मतिः ॥ ३८ ॥ 'वे मेरे विनाशसे उत्साहशून्य हो जायँगे, अपने बल और पराक्रम खो बैठेंगे और सर्वथा शक्तिहीन हो जायँगे, ऐसा मेरा विश्वास है' ॥ ३८ ॥ एवंविधं बहु तदा विललाप वृकोदरः भुजङ्गभोगसंरुद्धो नाशकच्च विचेष्टितुम् ॥ ३९ ॥ जनमेजय! उस समय भीमसेनने इस तरहकी बहुत-सी बातें कहकर देरतक विलाप किया। वे सर्पके शरीरसे इस प्रकार जकड़ गये थे कि हिल-डुल भी नहीं सकते थे ॥ ३९ ॥ युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो बभूवास्वस्थचेतनः । अनिष्टदर्शनान् घोरानुत्पातान् परिचिन्तयन् ॥ ४० ॥ उधर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अनिष्टसूचक भयंकर उत्पातोंको देखकर बड़ी चिन्तामें पड़े। वे व्याकुल हो गये ॥ ४० ॥ दारुणं ह्यशिवं नादं शिवा दक्षिणतः स्थिता । दीप्तायां दिशि वित्रस्ता रौति तस्याश्रमस्य ह ॥ ४१ ॥ उनके आश्रमसे दक्षिण दिशामें, जहाँ आग लगी हुई थी, एक डरी हुई सियारिन खड़ी हो दारुण अमंगलसूचक आर्तनाद करने लगी ॥ ४१ ॥ एकपक्षाक्षिचरणा वर्तिका घोरदर्शना । रक्तं वमन्ती ददृशे प्रत्यादित्यमभासुरा ॥ ४२ ॥ एक पाँख, एक आँख तथा एक पैरवाली भयंकर और मलिन वर्तिका (बटेर चिड़िया) सूर्यकी ओर रक्त उगलती हुई दिखायी दी ॥ ४२ ॥ प्रववौ चानिलो रूक्षश्चण्डः शर्करकर्षणः । अपसव्यानि सर्वाणि मृगपक्षिरुतानि च ॥ ४३ ॥ उस समय कंकड़ बरसानेवाली रूखी और प्रचण्ड वायु बह रही थी और पशु-पक्षियोंके सम्पूर्ण शब्द दाहिनी ओर हो रहे थे ॥ ४३ ॥ पृष्ठतो वायसः कृष्णो याहि याहीति शंसति । मुहुर्मुहुः स्फुरति च दक्षिणोऽस्य भुजस्तथा ॥ ४४ ॥ पीछेकी ओरसे काला कौवा 'जाओ-जाओ' की रट लगा रहा था और उनकी दाहिनी बाँह बार-बार फड़क उठती थी ॥ ४४ ॥ हृदयं चरणश्चापि वामोऽस्य परितप्यति । सव्यस्याक्ष्णो विकारश्चाप्यनिष्टः समपद्यत ॥ ४५ ॥ उनके हृदय तथा बायें पैरमें पीड़ा होने लगी। बायीं आँखमें अनिष्टसूचक विकार उत्पन्न हो गया ॥ ४५ ॥ धर्मराजोऽपि मेधावी मन्यमानो महत् भयम् । द्रौपदीं परिपप्रच्छ क्व भीम इति भारत ॥ ४६ ॥