भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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(मार्कण्डेयसमस्यापर्व)

द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुनः द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

निदाघान्तकरः कालः सर्वभूतसुखावहः ।
तत्रैव वसतां तेषां प्रावृट् समभिपद्यत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर ग्रीष्म-ऋतुकी समाप्ति सूचित करनेवाला वर्षाकाल आया, जो समस्त प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाला था। पाण्डव अभी द्वैतवनमें ही थे, उसी समय वर्षा-ऋतु आ गयी ॥ १ ॥
छादयन्तो महाघोषाः खं दिशश्च बलाहकाः ।
प्रववर्षुर्दिवारात्रमसिताः सततं तदा ॥ २ ॥
तब काले-काले मेघ जोर-जोरसे गर्जना करते हुए आकाश और दिशाओंमें छा गये और दिन-रात निरन्तर जलकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
तपात्ययनिकेताश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
अपेतार्कप्रभाजालाः सविद्युद्विमलप्रभाः ॥ ३ ॥
वे वर्षामें तम्बूके समान जान पड़ते थे। उनकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी थी। उन्होंने सूर्यके प्रभापुञ्जको तो ढँक दिया था और विद्युत्की निर्मल प्रभा धारण कर ली थी ॥ ३ ॥
विरूढशष्पा धरणी मत्तदंशसरीसृपा ।
बभूव पयसा सिक्ता शान्ता सर्वमनोरमा ॥ ४ ॥
धरतीपर घास जम गयी। मतवाले डाँस और सर्प आदि विचरने लगे। पृथ्वी जलसे अभिषिक्त होकर शान्त और सबके लिये मनोरम हो गयी ॥ ४ ॥
न स्म प्रज्ञायते किंचिदम्भसा समवस्तृते ।
समं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि च ॥ ५ ॥
सब ओर इतना पानी भर गया कि ऊँचा-नीचा, समतल, नदी अथवा पेड़-पौधे आदिका पता नहीं चलता था ॥ ५ ॥
क्षुब्धतोया महावेगाः श्वसमाना इवाशुगाः ।