भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद

मार्कण्डेय उवाच

अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरंजय ।
पृष्ट्या मुनिना वीर शृणु तार्क्ष्येण धीमता ॥ १ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**शत्रुओंकी राजधानी-पर विजय पानेवाले पाण्डुनन्दन! इसी विषयमें परम बुद्धिमान् तार्क्ष्य मुनिने सरस्वतीदेवीसे कुछ प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें सरस्वतीदेवीने जो कुछ कहा था, वह तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो ॥ १ ॥

तार्क्ष्य उवाच

किं नु श्रेयः पुरुषस्येह भद्रे
कथं कुर्वन् न च्यवते स्वधर्मात् ।
आचक्ष्व मे चारुसर्वाङ्गि कुर्यां
त्वया शिष्टो न च्यवेयं स्वधर्मात् ॥ २ ॥

**तार्क्ष्यने पूछा—**भद्रे! इस संसारमें मनुष्यका कल्याण करनेवाली वस्तु क्या है? किस प्रकार आचरण करनेवाला पुरुष अपने धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता है? सर्वांगसुन्दरी देवि! तुम मुझसे इसका वर्णन करो। मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा। मुझे विश्वास है कि तुमसे उपदेश ग्रहण करके मैं अपने धर्मसे गिर नहीं सकता ॥ २ ॥

कथं वाग्निं जुहुयां पूजये वा
कस्मिन् काले केन धर्मो न नश्येत् ।
एतत् सर्वं सुभगे प्रब्रवीहि
यथा लोकान् विरजाः संचरेयम् ॥ ३ ॥

मैं कैसे और किस समय अग्निमें हवन अथवा उसका पूजन करूँ? क्या करनेसे धर्मका नाश नहीं होता है? सुभगे! तुम ये सारी बातें मुझसे बताओ। जिससे मैं रजोगुणरहित होकर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करूँ ॥ ३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

एवं पृष्टा प्रीतियुक्तेन तेन
शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमबुद्धियुक्तम् ।
तार्क्ष्यं विप्रं धर्मयुक्तं हितं च
सरस्वती वाक्यमिदं बभाषे ॥ ४ ॥