महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1265, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! उनके इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछनेपर सरस्वतीदेवीने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्यको धर्मात्मा, उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं श्रवणके लिये उत्सुक देखकर उनसे यह हितकर वचन कहा— ॥ ४ ॥
सरस्वत्युवाच
यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं
स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः ।
स वै पारं देवलोकस्य गन्ता
सहामरैः प्राप्नुयात् प्रीतियोगम् ॥ ५ ॥
**सरस्वती बोली—**मुने! जो प्रमाद छोड़कर पवित्र भावसे नित्य स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गोंसे प्राप्त होनेयोग्य सगुण ब्रह्मको जान लेता है, वह देवलोकसे उठकर ब्रह्मलोकमें जाता है और देवताओंके साथ प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर लेता है ॥ ५ ॥
तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः
सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः ।
अकर्दमा मीनवत्यः सुतीर्था
हिरण्मयैरावृताः पुण्डरीकैः ॥ ६ ॥
वहाँ सुन्दर, विशाल, शोकरहित, अत्यन्त पवित्र तथा सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित छोटे-छोटे सरोवर हैं। उनमें कीचड़का नाम नहीं है। उनमें मछलियाँ निवास करती हैं। उन सरोवरोंमें उतरनेके लिये मनोहर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं और वे सभी सरोवर सुवर्णमय कमल-पुष्पोंसे आच्छादित रहते हैं ॥ ६ ॥
तासां तीरेष्वासते पुण्यभाजो
महीयमानाः पृथगप्सरोभिः ।
सुपुण्यगन्धाभिरलंकृताभि-
र्हिरण्यवर्णाभिरतीव हृष्टाः ॥ ७ ॥
उनके तटोंपर पूजनीय पुण्यात्मा पुरुष पृथक्-पृथक् अप्सराओंके साथ सानन्द प्रतिष्ठित होते हैं। वे अप्सराएँ अत्यन्त पवित्र सुगन्धसे सुवासित, विविध आभूषणोंसे विभूषित तथा स्वर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होती हैं ॥ ७ ॥
परं लोकं गोप्रदास्त्वाप्नुवन्ति
दत्त्वानड्वाहं सूर्यलोकं व्रजन्ति ।
वासो दत्त्वा चान्द्रमसं तु लोकं
दत्त्वा हिरण्यममरत्वमेति ॥ ८ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्य उत्तम लोकमें जाते हैं। छकड़े ढोनेवाले बलवान् बैलोंका दान करनेसे दाताओंको सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। वस्त्रदानसे चन्द्रलोक और सुवर्णदानसे