महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमरत्वकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ धेनुं दत्त्वा सुप्रभां सुप्रदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद् वर्षाण्यासते देवलोके ॥ ९ ॥ जो अच्छे रंगकी हो, सुगमतासे दूध दुहा लेती हो, सुन्दर बछड़े देनेवाली हो और बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका जो लोग दान करते हैं, वे गौके शरीरमें जितने रोएँ हों, उतने वर्षतक देवलोकमें निवास करते हैं ॥ ९ ॥ अनड्वाहं सुव्रतं यो ददाति हलस्य वोढारमनन्तवीर्यम् । धुरन्धरं बलवन्तं युवानं प्राप्नोति लोकान् दश धेनुदस्य ॥ १० ॥ जो मनुष्य अच्छे स्वभाववाले, अत्यन्त शक्तिशाली, हल खींचनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान् और तरुण अवस्थावाले बैलका दान करता है, वह धेनुदान करनेवाले पुरुषसे दसगुने पुण्यलोक प्राप्त करता है ॥ १० ॥ ददाति यो वै कपिलां सचैलां कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । तैस्तैर्गुणैः कामदुहाथ भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ॥ ११ ॥ जो काँसेकी दोहनी, वस्त्र, उत्तरकालिक दक्षिणाद्रव्यके साथ कपिला गौका दान करता है, उसकी दी हुई वह गौ उन-उन गुणोंके साथ कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँच जाती है ॥ ११ ॥ यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- स्तावत् फलं भवति गोप्रदाने । पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व- मासप्तमं तारयते परत्र ॥ १२ ॥ उस धेनुके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता गोदानके पुण्य-फलका उपभोग करता है। साथ ही वह गौ परलोकमें दाताके पुत्रों, पौत्रों एवं सात पीढ़ींतकके समूचे कुलका उद्धार करती है ॥ १२ ॥ सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥ १३ ॥