भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1362, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1362

**राजाने कहा—**बाज! उक्षा (ऋषभकन्द) अथवा वेहत नामक ओषधियाँ बड़ी पुष्टिकारक होती हैं। मेरे सेवक जाकर उनकी खोज करें और पर्याप्त मात्रामें भातके साथ उन्हें पकाकर तुम्हारे पास पहुँचा दें। भयभीत कपोतके बदलेमें मेरे पाससे मिलनेवाला यह उचित मूल्य होगा। इसे ले लो, किंतु इस कबूतरको न मारो ॥ १७ ॥

त्यजे प्राणान् नैव दद्यां कपोतं
सौम्यो ह्ययं किं न जानासि श्येन ।
यथा क्लेशं मा कुरुष्वेह सौम्य
नाहं कपोतमर्पयिष्ये कथंचित् ॥ १८ ॥

मैं अपने प्राण दे दूँगा, किंतु इस कबूतरको नहीं दूँगा। बाज! क्या तुम नहीं जानते, यह कितना सुन्दर स्वयं कैसा भोला-भाला है? सौम्य! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ। मैं इस कबूतरको किसी तरह तुम्हारे हाथमें नहीं दूँगा ॥ १८ ॥

यथा मां वै साधुवादैः प्रसन्नाः
प्रशंसेयुः शिबयः कर्मणा तु ।
यथा श्येन प्रियमेव कुर्यां
प्रशाधि मां यद् वदेस्तत् करोमि ॥ १९ ॥

बाज! जिस कर्मसे शिबिदेशके लोग प्रसन्न होकर मुझे साधुवाद देते हुए मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करें और जिससे मेरेद्वारा तुम्हारा भी प्रिय कार्य बन सके, वह बताओ। उसीके लिये मुझे आज्ञा दो। मैं वही करूँगा ॥ १९ ॥

श्येन उवाच

ऊरोर्दक्षिणादुत्कृत्य स्वपिशितं तावद् राजन् यावन्मांसं कपोतेन समम् । तथा तस्मात् साधु त्रातः कपोतः प्रशंसेयुश्च शिबयः कृतं च प्रियं स्यान्ममेति ॥ २० ॥

**बाज बोला—**राजन्! अपनी दायीं जाँघसे उतना ही मांस काटकर दो, जितना इस कबूतरके बराबर हो सके। ऐसा करनेसे कबूतरकी भलीभाँति रक्षा हो सकती है। इसीसे शिबिदेशकी प्रजा आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा ॥ २० ॥

अथ स दक्षिणादूरोत्कृत्य स्वमांसपेशीं तुलयाऽऽधारयत् । गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥ २१ ॥

तब राजाने अपनी दायीं जाँघसे मांस काटकर उसे तराजूके एक पलड़ेपर रखा, किंतु कबूतरके साथ तौलनेपर वही अधिक भारी निकला ॥ २१ ॥

पुनरन्यमुञ्चकर्त गुरुतर एव कपोतः । एवं सर्वं समधिकृत्य शरीरं तुलायामारोपयामास । तत् तथापि गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥ २२ ॥