भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1363

राजाने फिर दूसरी बार अपने शरीरका मांस काटकर रखा, तो भी कबूतरका ही पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार क्रमशः उन्होंने अपने सभी अंगोंका मांस काट-काटकर तराजूपर चढ़ाया तो भी कबूतर ही भारी रहा ॥ २२ ॥

अथ राजा स्वयमेव तुलाममारोह । न च व्यलीकमासीद् राज्ञ एतद् वृत्तान्तं दृष्ट्वा त्रात इत्युक्त्वा प्रालीयत श्येनोऽथ राजा अब्रवीत् ॥ २३ ॥

तब राजा स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये। ऐसा करते समय उनके मनमें क्लेश नहीं हुआ। यह घटना देखकर बाज बोल उठा—‘हो गयी कबूतरकी प्राणरक्षा।' ऐसा कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया। अब राजा शिबि कबूतरसे बोले— ॥ २३ ॥

कपोतं विद्युः शिबयस्त्वां कपोत पृच्छामि ते शकुने को नु श्येनः । नानीश्वर ईदृशं जातु कुर्या- देतं प्रश्नं भगवन् मे विचक्ष्व ॥ २४ ॥

‘कपोत! ये शिबिलोग तो तुम्हें कबूतर ही समझते थे। पक्षिप्रवर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, यह बाज कौन था? ईश्वरके सिवा दूसरा कोई कभी ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। भगवन्! मेरे इस प्रश्नका यथावत् उत्तर दो' ॥ २४ ॥

कपोत उवाच

वैश्वानरोऽहं ज्वलनो धूमकेतु- रथैव श्येनो वज्रहस्तः शचीपतिः । साधु ज्ञातुं त्वामृषभं सौरभेय नौ जिज्ञासाया त्वत्सकाशं प्रपन्नौ ॥ २५ ॥

कबूतर बोला— राजन्! मैं धूममयी ध्वजासे विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाजके रूपमें साक्षात् वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे। सुरथानन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो। हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठताकी परीक्षाके लिये यहाँ आये थे ॥ २५ ॥

यामेतां पेशीं मम निष्क्रयाय प्रादाद् भवानसिनोत्कृत्य राजन् । एतद् वो लक्ष्म शिवं करोमि हिरण्यवर्णं रुचिरं पुण्यगन्धम् ॥ २६ ॥

राजन्! तुमने मेरी रक्षाके लिये जो तलवारसे काटकर अपना यह मांस दिया है, इसके घावको मैं अभी अच्छा कर देता हूँ। यहाँकी चमड़ीका रंग सुन्दर और सुनहला हो जायगा तथा इससे बड़ी पवित्र सुगन्ध फैलती रहेगी, यह तुम्हारा राजचिह्न होगा ॥ २६ ॥

एतासां प्रजानां पालयिता यशस्वी सुरर्षीणामथ सम्मतो भृशम् ।