भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1364

एतस्मात् पार्श्वात् पुरुषो जनिष्यति कपोतरोमेति च तस्य नाम ॥ २७ ॥ तुम्हारे इस दक्षिण पार्श्वसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो इन प्रजाओंका पालक और यशस्वी होनेके साथ ही देवर्षियोंके अत्यन्त आदरका पात्र होगा। उसका नाम होगा, 'कपोतरोमा' ॥ २७ ॥

कपोतरोमाणं शिबिनौद्भिदं पुत्रं प्राप्स्यसि नृप वृषसंहननं यशोदीप्यमानं द्रष्टासि शूरमृषभं सौरथानाम् ॥ २८ ॥ राजन्! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न किया हुआ वह पुत्र, जिसे तुम भविष्यमें प्राप्त करोगे, तुम्हारी जाँघका भेदन करके प्रकट होगा; इसीलिये औद्भिद कहलायेगा। उसके शरीरके रोएँ कबूतरके समान होंगे। उसका शरीर साँड़के समान हृष्ट-पुष्ट होगा। तुम देखोगे कि वह सुयशसे प्रकाशित हो रहा है। सुरथाके वंशजोंमें वह सर्वश्रेष्ठ शूरवीर होगा ॥ (इतना कहकर अग्निदेव अन्तर्धान हो गये।)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि शिबिचरिते सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥


* राजाका यह कठोर नियम था कि वे सोना-चाँदीके सिवा और कुछ ब्राह्मणको नहीं देते थे, जो उनसे ये ही वस्तुएँ माँगता, उसे प्रसन्नतापूर्वक देते थे। जो दूसरी कोई चीज माँगता, उसे यह समझकर कि यह मेरा नियम भंग करना चाहता है, दण्ड देते थे। ब्राह्मण देवता दूसरेके भेजनेसे आये थे, इसलिये राजाने एक हजार अश्वोंके मूल्यसे अधिक सोना-चाँदी उन्हें दिया।