भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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अष्टनव्यधिकशततमोऽध्यायः

देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच

भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम् । अथाचष्ट मार्कण्डेयः । अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन् ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की—‘मुने! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये।’ तब मार्कण्डेयजीने कहा—‘धर्मराज! विश्वामित्रके पुत्र अष्टकके अश्वमेधयज्ञमें सब राजा पधारे थे ।। १ ।।

भ्रातरश्चास्य प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनर इति । स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह रथेन प्रायात् । ते च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान् रथमित्यब्रुवन् ।। २ ।।

‘अष्टकके तीन भाई प्रतर्दन, वसुमना तथा उशीनर-पुत्र शिबि भी उस यज्ञमें आये थे। यज्ञ समाप्त होनेपर एक दिन अष्टक अपने भाइयोंके साथ रथपर आरूढ़ हो (स्वर्गकी ओर) जा रहे थे। इसी समय रास्तेमें देवर्षि नारदजी आते दिखायी दिये। तब उन तीनोंने उन्हें प्रणाम करके कहा—‘भगवन् आप भी रथपर आ जाइये’ ।। २ ।।

तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षिं नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किञ्चिदिच्छेयं प्रष्टुमिति ।। ३ ।।

‘तब नारदजी ‘तथास्तु’ कहकर उस रथपर बैठ गये। तदनन्तर उनमेंसे एकने देवर्षि नारदसे कहा—‘भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करके कुछ पूछना चाहता हूँ’ ।। ३ ।।

पृच्छेत्यब्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्वगुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भि-र्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टकोऽवतरे-दित्यब्रवीदृषिः ।। ४ ।।

‘देवर्षिने कहा—‘पूछो’ तब उसने इस प्रकार कहा—‘भगवन्! हम सब लोग दीर्घायु तथा सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण सदा प्रसन्न रहते हैं। हम चारोंको दीर्घकालतक उपभोगमें आनेवाले स्वर्ग-लोकमें जाना है, किंतु वहाँसे सर्वप्रथम कौन इस भूतपर उतर आयेगा?’ देवर्षिने कहा—‘सबसे पहले अष्टक उतरेगा’ ।। ४ ।।

किं कारणमित्यपृच्छत् । अथाचष्टाष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानि गोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं कस्येमा गाव इति सोऽब्रवीत् । मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं श्लाघति कथितेन । एषोऽवतरेदथ त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत् ।। ५ ।।