महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1366, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'फिर उसने पूछा—‘क्या कारण है कि अष्टक ही उतरेगा?’ तब नारदजीने कहा—एक दिन मैं अष्टकके घर ही ठहरा था। उस दिन अष्टक मुझे रथपर बिठाकर भ्रमणके लिये ले जा रहे थे। मैंने रास्तेमें देखा, भिन्न-भिन्न रंगकी कई हजार गौएँ पृथक्-पृथक् चर रही हैं। उन्हें देखकर मैंने अष्टकसे पूछा—‘ये किसकी गौएँ हैं।’ इन्होंने उत्तर दिया—‘ये मेरी दान की हुई गौएँ हैं।’ इस प्रकार ये स्वयं अपने किये हुए दानका बखान करके आत्मश्लाघा करते हैं। इसीलिये इन्हें स्वर्गसे पहले उतरना पड़ेगा।’ तत्पश्चात् उन लोगोंने पुनः प्रश्न किया—‘यदि हम शेष तीनों भाई स्वर्गमें जायँ, तो सबसे पहले किसको उतरना पड़ेगा?’ ॥ ५ ॥
प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः । तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत् ॥ ६ ॥
अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता-मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददात् ॥ ७ ॥
'देवर्षिने उत्तर दिया—‘प्रतर्दनको।’ ‘इसमें क्या कारण है?’ ऐसा प्रश्न होनेपर देवर्षिने उत्तर दिया—‘एक दिन मैं प्रतर्दनके घर भी ठहरा था। ये मुझे रथसे ले जा रहे थे। उस समय एक ब्राह्मणने आकर इनसे याचना की—‘आप मुझे एक अश्व दे दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको उत्तर दिया—‘लौटनेपर दे दूँगा।’ ब्राह्मणने कहा—‘नहीं, तुरंत दे दीजिये।’ ‘अच्छा तो तुरंत ही लीजिये’ यों कहकर इन्होंने रथके दाहिने पार्श्वका घोड़ा खोलकर उसे दे दिया’ ॥ ६-७ ॥
अथान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् । तथैव चैनमुक्तवा वामपार्ष्णिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपनह्य वामं धुर्यमददत् ॥ ८ ॥
'इतनेहीमें एक-दूसरा ब्राह्मण आया। उसे भी घोड़ेकी ही आवश्यकता थी। जब उसने याचना की, तब राजाने पूर्ववत् उससे भी यही कहा—‘लौटनेपर दूँगा।’ परंतु उसके आग्रह करनेपर उन्होंने रथके वाम पार्श्वका एक घोड़ा दिया। फिर वे आगे बढ़ गये। तदनन्तर एक घोड़ा माँगनेवाला दूसरा ब्राह्मण आया। उसने भी जल्दी ही माँगा। तब राजाने उसे बायें धुरेका बोझ ढोनेवाला अश्व खोल करके दे दिया ॥ ८ ॥
अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मणस्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाश्वं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति ॥ ९ ॥
'तत्पश्चात् जब वे आगे बढ़े, तब फिर एक अश्वका इच्छुक ब्राह्मण आ पहुँचा। उसके माँगनेपर राजाने कहा—‘मैं शीघ्र ही अपने लक्ष्यतक पहुँचकर घोड़ा दे दूँगा।’ ब्राह्मण बोला—‘मुझे तुरंत दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको अश्व देकर स्वयं रथका धुरा पकड़ लिया और कहा—‘ब्राह्मणोंके लिये ऐसा करना सर्वथा उचित नहीं है’ ॥ ९ ॥