महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1367, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंय एष ददाति चासूयति च तेन व्याहृतेन तथावतरेत् । अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति
कोऽवतरेत् ।। १० ।।
'ये प्रतर्दन दान देते हैं और ब्राह्मणकी निन्दा भी करते हैं, अतः वह निन्दायुक्त वचन
बोलनेके कारण पहले इन्हींको स्वर्गसे उतरना पड़ेगा। तब पुनः प्रश्न किया गया, 'हम शेष
दो भाई जा रहे हैं, उनमेंसे कौन पहले स्वर्गसे नीचे उतरेगा?' ।। १० ।।
वसुमना अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ।। ११ ।।
'देवर्षिने उत्तर दिया- 'वसुमना पहले उतरेंगे' ।।
किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ।।
१२ ।।
'तब उन्होंने पूछा- 'इसका क्या कारण है?' नारदजी बोले- 'एक दिन मैं घूमता-
घामता वसुमनाके घरपर जा पहुँचा ।। १२ ।।
स्वस्तिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन तमहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु
ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः ।। १३ ।।
'उस दिन उनके यहाँ स्वस्तिवाचन हो रहा था। राजाके यहाँ एक ऐसा रथ था, जो
पर्वत, आकाश और समुद्र आदि दुर्गम स्थानोंपर भी सुगमतासे आ-जा सकता था। उसका
नाम था 'पुष्परथ'। मैं उसीके प्रयोजनसे राजाके यहाँ गया था। जब ब्राह्मणलोग
स्वस्तिवाचन कर चुके, तब राजाने ब्राह्मणोंको अपना वह रथ दिखाया ।। १३ ।।
तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद् भगवता रथः प्रशस्तः । एष भगवतो रथ
इति ।। १४ ।।
'उस समय मैंने उस रथकी बड़ी प्रशंसा की।' राजा बोले- 'भगवन्! आपने इस रथकी
प्रशंसा की है। अतः यह रथ आपहीका है' ।। १४ ।।
अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत् । सम्यगयमेष
भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा
ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत् । अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि
सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावत्तरेत् ।। १५ ।।
'तदनन्तर एक दिन और मैं राजाके यहाँ उपस्थित हुआ। पुनः मेरे जानेका उद्देश्य
पुष्परथको प्राप्त करना ही था। उस दिन भी राजाने बड़ी आवभगतके साथ कहा
—'भगवन्! यह रथ आपका ही है।' फिर तीसरी बार मैंने उनके यहाँ जाकर
स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न किया। राजाने ब्राह्मणोंको उस रथका दर्शन कराते हुए मेरी
ओर देखकर कहा- 'भगवन्! आपने पुष्परथके लिये अच्छे स्वस्तिवाचन किये।' (ऐसा
कहकर भी उन्होंने रथ नहीं दिया।) इस (छलयुक्त) वचनसे वसुमना ही पहले स्वर्गसे
पृथ्वीपर उतरेंगे' ।। १५ ।।