महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1371, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाः पर्यपृच्छन्नस्ति कश्चिद् भवतश्चिरजाततर इति ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऋषियों तथा पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा—‘भगवन्! कोई आपसे भी पहलेका उत्पन्न चिरजीवी इस जगत्में है या नहीं? ॥
स तानुवाचास्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्युम्नो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात् प्रच्युतः कीर्तिस्ते व्युच्छिन्नेति स मामुपातिष्ठदथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा—‘है क्यों नहीं, सुनो। एक समय राजर्षि इन्द्रद्युम्न अपना पुण्य क्षीण हो जानेके कारण यह कहकर स्वर्गलोकसे नीचे गिरा दिये गये थे कि ‘जगत्में तुम्हारी कीर्ति नष्ट हो गयी है।’ स्वर्गसे गिरनेपर वे मेरे पास आये और बोले—‘क्या आप मुझे पहचानते हैं?’ ॥ २ ॥
तमहमब्रुवं कार्यचेष्टाकुलत्वान्न वयं वासायनिका ग्रामैकरात्रवासिनो न प्रत्यभिजानीमोऽप्यात्मनोऽर्थानामनुष्ठानं न शरीरोपतापेनात्मनः समारभामोऽर्थानामनुष्ठानम् ॥ ३ ॥
‘मैंने उनसे कहा—‘हमलोग तीर्थयात्रा आदि भिन्न-भिन्न पुण्य कार्योंकी चेष्टाओंमें व्यग्र रहते हैं, अतः किसी एक स्थानपर सदा नहीं रहते। एक गाँवमें केवल एक रात निवास करते हैं। अपने कार्योंका अनुष्ठान भी हमें भूल जाता है। व्रत-उपवास आदिमें लगे रहनेसे अपने शरीरको सदा कष्ट पहुँचानेके कारण आवश्यक कार्योंका आरम्भ भी हमसे नहीं हो पाता है, ऐसी दशामें हम आपको कैसे जान सकते हैं?’ ॥ ३ ॥
(एवमुक्तो राजर्षिरिन्द्रद्युम्नः पुनर्मामब्रवीद् अथास्ति कश्चित् त्वत्तश्चिरं जाततर इति ॥)
‘मेरे ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः मुझसे पूछा—‘क्या आपसे भी पहलेका पैदा हुआ कोई पुरातन प्राणी है?’ ॥
(तं पुनः प्रत्यब्रवम्) अस्ति खलु हिमवति प्रावारकर्णो नामोलूकः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजातो भवन्तं यदि जानीयादितः प्रकृष्टे चाध्वनि हिमवांस्तत्रासौ प्रतिवसतीति ॥ ४ ॥
‘तब मैंने उन्हें पुनः उत्तर दिया—‘हिमालय पर्वतपर प्रावारकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक उलूक निवास करता है। वह मुझसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ है। सम्भव है, वह आपको जानता हो। यहाँसे बहुत दूरकी यात्रा करनेपर हिमालय पर्वत मिलेगा। वहीं वह रहता है’ ॥ ४ ॥