महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1372, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद् यत्र बभूवोलूकः । अथैनं स राजा पप्रच्छ प्रतिजानाति मां भवानिति ॥ ५ ॥ 'तब इन्द्रद्युम्न अश्व बनकर मुझे वहाँतक ले गये, जहाँ उलूक रहता था। वहाँ जाकर राजाने उससे पूछा—‘क्या आप मुझे जानते हैं?’ ॥ ५ ॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वाब्रवीदेनं नाभिजानामि भवन्तमिति स एवमुक्त इन्द्रद्युम्नः पुनस्तमुलूक-मब्रवीद् राजर्षिः ॥ ६ ॥ ‘उसने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उनसे कहा—‘मैं आपको नहीं जानता हूँ।’ उलूकके ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः उससे पूछा— ॥ ६ ॥
अथास्ति कश्चिद् भवतः सकाशाच्चिरजात इति स एवमुक्तोऽब्रवीदस्ति खल्विन्द्रद्युम्नं नाम सरस्तस्मिन् नाडीजङ्घो नाम बकः प्रतिवसति सोऽस्मत्तश्चिरजाततरस्तं पृच्छेति तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकमादाय तत् सरोऽगच्छद् यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम बको बभूव ॥ ७ ॥ ‘क्या आपसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ कोई चिरजीवी प्राणी है?’ उनके ऐसा पूछनेपर उलूकने कहा—‘इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है। वहाँ नाडीजंघ नामसे प्रसिद्ध एक बक निवास करता है। वह हमसे बहुत पहलेका उत्पन्न हुआ है। उससे पूछिये।’ तब इन्द्रद्युम्न मुझको और उलूकको भी साथ लेकर उस सरोवरपर गये जहाँ नाडीजंघ बक निवास करता था ॥ ७ ॥
सोऽस्माभिः पृष्टो भवानिममिन्द्रद्युम्नं राजान-मभिजानातीति स एवं मुहूर्तं ध्यात्वाब्रवीन्ना-भिजानाम्यहमिन्द्रद्युम्नं राजानमिति । ततः सोऽस्माभिः पृष्टः कश्चिद् भवतोऽन्यश्चिरजाततरोऽस्तीति । स नोऽब्रवीदस्ति खल्वस्मिन्नेव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजाततरः । स यदि कथंचिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छध्वमिति ॥ ८ ॥ ‘हमलोगोंने उस बकसे पूछा—‘क्या आप—राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं?’ उसने दो घड़ीतक सोचकर उत्तर दिया—‘मैं राजा इन्द्रद्युम्नको नहीं जानता हूँ।’ तब हमलोगोंने उनसे पूछा—‘क्या दूसरा कोई प्राणी ऐसा है? जिसका जन्म आपसे भी पहले हुआ हो?’ उसने हमसे कहा—‘है; इसी सरोवरमें अकूपार नामक एक कछुआ रहता है। वह मुझसे भी पहले उत्पन्न हुआ है। आपलोग उस अकूपारसे ही पूछिये। सम्भव है, वह इन राजर्षिको किसी तरह जानता हो’ ॥ ८ ॥
ततः स बकस्तमकूपारं कच्छपं विज्ञापयामास । अस्माकमभिप्रेतं भवन्तं किञ्चिदर्थमभिप्रष्टुं साध्वागम्यतां तावदिति तच्छ्रुत्वा कच्छपस्तस्मात् सरस उत्थायाभ्यगच्छद् यत्र तिष्ठामो वयं तस्य सरसस्तीरे आगतं चैनं वयमपृच्छाम भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति ॥ ९ ॥