महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1373, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'तब उस बकने अकूपार नामक कछुएको यह सूचना दी कि 'हमलोग आपसे कुछ
अभीष्ट प्रश्न पूछना चाहते हैं। कृपया आइये।' यह संदेश सुनकर वह कछुआ उस सरोवरसे
निकलकर वहीं आया, जहाँ हमलोग तटपर खड़े थे। आनेपर उससे हमलोगोंने पूछा- 'क्या
आप राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं?' ।। ९ ।।
स मुहूर्तं ध्यात्वा बाष्पसम्पूर्णनयन उद्विग्न-हृदयो वेपमानो विसंज्ञकल्पः
प्राञ्जलिरब्रवीत् । किमहमेनं न प्रत्यभिज्ञास्यामीह ह्यनेन सहस्र-कृत्विश्चितिषु यूपा
आहिताः ।। १० ।।
'उसने दो घड़ीतक ध्यान करके नेत्रोंमें आँसू भरकर उद्विग्न हृदयसे काँपते हुए
अचेतकी-सी दशामें हाथ जोड़कर कहा- 'मैं इन्हें क्यों नहीं पहचानूँगा। इन्होंने एक हजार
बार अग्निस्थापनके समय यज्ञ-यूपोंकी स्थापना की है ।। १० ।।
सरश्चेदमस्य दक्षिणाभिर्दत्ताभिर्गोभिरति-क्रममाणाभिः कृतम् । अत्र चाहं
प्रतिवसामीति ।। ११ ।।
'इनके द्वारा दक्षिणामें दी हुई गौओंके आने-जानेसे यह सरोवर बन गया है, जिसमें मैं
निवास कर रहा हूँ' ।। ११ ।।
अथैतत् सकलं कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा तदनन्तरं देवलोकाद् देवरथः प्रादुरासीद्
वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति प्रस्तुतस्ते स्वर्गो यथोचितं स्थानं प्रतिपद्यस्व
कीर्तिमानस्यव्यग्रो याहीति ।। १२ ।।
'कच्छपके मुँहसे ये सारी बातें सुन लेनेके पश्चात् देवलोकसे एक दिव्य रथ आकर
प्रकट हुआ और उसमेंसे इन्द्रद्युम्नके प्रति कही हुई कुछ बातें सुनायी देने लगीं- 'राजन्!
आपके लिये स्वर्गलोक प्रस्तुत है। वहाँ चलकर यथोचित स्थान ग्रहण करें। आप कीर्तिमान्
हैं। अतः निश्चिन्त होकर स्वर्गलोककी यात्रा करें' ।। १२ ।।
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
दिवं स्पृशति भूमिं च
शब्दः पुण्यस्य कर्मणः ।
यावत् स शब्दो भवति
तावत् पुरुष उच्यते ।। १३ ।।
'इस विषयमें ये श्लोक हैं— 'जबतक मनुष्यके पुण्यकर्मका शब्द भूलोक और
देवलोकका स्पर्श करता है, जबतक दोनों लोकोंमें उसकी कीर्ति बनी रहती है, तभीतक वह
पुरुष स्वर्गलोकका निवासी बताया जाता है ।। १३ ।।
अकीर्तिः कीर्त्यते लोके
यस्य भूतस्य कस्यचित् ।
स पतत्यधमाँल्लोकान्
यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते ।। १४ ।।