भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1374

'संसारमें जिस किसी प्राणीकी अपकीर्ति कही जाती है—जबतक उसके अपयशका शब्द गूँजता रहता है, तबतकके लिये वह नीचेके लोकोंमें गिर जाता है ।। १४ ।। तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या- दनन्ताय नरः सदा । विहाय चित्तं पापिष्ठं धर्ममेव समाश्रयेत् ।। १५ ।। 'इसलिये मनुष्यको सदा कल्याणकारी सत्कर्मोंमें ही लगे रहना चाहिये। इससे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। पापपूर्ण चित्त (चिन्तन या विचार)-का परित्याग करके सदा धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये' ।। १५ ।। इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत् तिष्ठ तावद् यावदिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति ।। १६ ।। 'देवदूतकी यह बात सुनकर राजाने कहा—'जबतक इन दोनों वृद्धोंको इनके स्थानपर पहुँचा न दूँ तबतक ठहरे रहो' ।। १६ ।। स मां प्रावारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संस्थितो यथोचितं स्थानं प्रतिपेदे । तन्मयानुभूतं चिरजीविनेदृशमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेयः ।। १७ ।। 'यह कहकर राजाने मुझे तथा प्रावारकर्ण नामक उलूकको यथोचित स्थानपर पहुँचा दिया और उसी रथसे स्वर्गकी ओर प्रस्थान करके वहाँ यथोचित स्थान प्राप्त कर लिया। इस प्रकार मैंने चिरजीवी होकर अनुभव किया है'—यह बात पाण्डवोंसे मार्कण्डेयजीने कही ।। पाण्डवाश्चोचुः साधु शोभनं भवता कृतं राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने प्रतिपादयतेत्यथैतानब्रवीदसौ ननु देवकीपुत्रेणापि कृष्णेन नरके मज्जमानो राजर्षिर्नृगस्तस्मात् कृच्छ्रात् पुनः समुद्धृत्य स्वर्गं प्रापित इति ।। १८ ।। पाण्डव बोले—'आपने यह बहुत अच्छा किया कि स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हुए राजा इन्द्रद्युम्नको पुनः अपने स्थानकी प्राप्ति करवा दी।' तब इनसे मार्कण्डेयजीने कहा—'देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने भी नरकमें डूबते हुए राजर्षि नृगको उस भारी संकटसे छुड़ाकर फिर स्वर्गमें पहुँचा दिया' ।। १८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि इन्द्रद्युम्नोपाख्याने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें इन्द्रद्युम्नोपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९९ ।।