महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1407, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका वध
मार्कण्डेय उवाच
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्कके इस प्रकार आग्रह करनेपर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्वने उनसे हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥
न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति ।
पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥
धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि ।
‘ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। भगवन्! मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डलमें अनुपम वीर है। यह धैर्यवान् और फुर्तीला है ॥ २ १/२ ॥
प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः ।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥
परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रोंके साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रोंको त्याग दिया है’ ॥
तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा ।
स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ।
तब अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनिने ‘तथास्तु’ कहकर राजाको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्वने महात्मा उत्तङ्कको अपना वह पुत्र सौंप दिया और धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा दे उत्तम तपोवनकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५ १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥