महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ।। ७ ।। एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम् । सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ।। ८ ।। तपस्याके धनी मुनीश्वर! ऐसा महाबली दैत्य तो मैंने कभी नहीं सुना था, अतः भगवन्! मैं इसके विषयमें यथार्थ बातें जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये ।। ७-८ ।।
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप । कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ।। ९ ।। मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। यह सारा वृत्तान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ।। ९ ।।
एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ।। १० ।। भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी कालके गालमें चले गये थे ।। १० ।।
प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् । यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ।। ११ ।। सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः । नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ।। १२ ।। उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान्को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं ।। ११-१२ ।।
लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः । नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ।। १३ ।। स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् । नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ।। १४ ।। साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।