महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर (शेषनागपर) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १३-१४ १/२ ॥
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥
स्वप्रभावाद् दुर्धर्षो महाबलपराक्रमः ।
वे चारों वेदोंके विद्वान् हैं। जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हींके स्वरूप हैं। उनके चार मुख हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। वे अपने प्रभावसे दुर्धर्ष हैं ॥ १५ १/२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ १६ ॥
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ।
ब्रह्माजीके प्रकट होनेके कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवोंने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरिको देखा ॥ १६ १/२ ॥
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥
वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान् है। वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनोंकी है। भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ॥ १७-१८ ॥
दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा ।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १९ ॥
राजन्! वे अपनी कान्ति और तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। शरीरसे वे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित होते थे। उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी ॥ १९ ॥
विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।
वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥
भगवान्को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे। उन दोनोंके द्वारा बार-बार डराये जानेपर