महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया। इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे। जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा ।। २०—२२ ।। दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ । ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ।। २३ ।। उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—‘तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है’ ।। २३ ।। तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ । प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ।। २४ ।। महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे। उन्होंने हँसकर इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् मधुसूदनसे एक साथ कहा— ।। २४ ।।