भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः

धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

धर्मव्याधस्तु निपुणं पुनरेव युधिष्ठिर ।
विप्रर्षभमुवाचेदं सर्वधर्मभृतां वर ।। १ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने विप्रवर कौशिकसे पुनः कुशलतापूर्वक कहना आरम्भ किया ।। १ ।।

व्याध उवाच

श्रुतिप्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका ।। २ ।।
व्याध बोला— वृद्ध पुरुषोंका कहना है कि 'धर्मके विषयमें केवल वेद ही प्रमाण है।' यह ठीक है, तो भी धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है। उसके अनन्त भेद और अनेक शाखाएँ हैं ।। २ ।।

प्राणान्तिके विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
अनृतेन भवेत् सत्यं सत्येनैवानृतं भवेत् ।। ३ ।।
(वेदके अनुसार सत्य धर्म और असत्य अधर्म हैं, परंतु) यदि किसीके प्राणोंपर संकट आ जाय अथवा कन्या आदिका विवाह तै करना हो तो ऐसे अवसरोंपर प्राणरक्षा आदिके लिये झूठ बोलनेकी आवश्यकता पड़ जाय तो वहाँ असत्यसे ही सत्यका फल मिलता है। इसके विपरीत (यदि सत्यभाषणसे किसीके प्राणोंपर संकट आ गया, तो वहाँ) सत्यसे ही असत्यका फल प्राप्त होता है ।। ३ ।।

यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा ।
विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ।। ४ ।।
जिससे परिणाममें प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो, वह वास्तवमें सत्य है। इसके विपरीत जिससे किसीका अहित होता हो या दूसरोंके प्राण जाते हों, वह देखनेमें सत्य होनेपर भी वास्तवमें असत्य एवं अधर्म है*। इस प्रकार विचार करके देखिये, धर्मकी गति कितनी सूक्ष्म है ।। ४ ।।

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।
अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ।। ५ ।।