महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसज्जनशिरोमणे! मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥ विषमां च दशां प्राप्तो देवान् गर्हति वै भृशम् । आत्मनः कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डितः ॥ ६ ॥ मूर्ख मानव संकटकी दशामें पड़नेपर देवताओंको बहुत कोसता है, उनकी भरपेट निन्दा करता है; किंतु वह यह नहीं समझता कि यह अपने ही कर्मोंका दोषावह परिणाम है ॥ ६ ॥ मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम । सुखदुःखविपर्यासान् सदा समुपपद्यते ॥ ७ ॥ नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नैव पौरुषम् । द्विजश्रेष्ठ! मूर्ख, शठ और चंचल चित्तवाला मनुष्य सदा ही भ्रमवश सुखमें दुःख और दुःखमें सुखबुद्धि कर लेता है। उस समय बुद्धि, उत्तम नीति (शिक्षा) तथा पुरुषार्थ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाते ॥ ७ ½ ॥ योऽयमिच्छेद यथा कामं तं तं कामं स आप्नुयात् ॥ ८ ॥ यदि स्यादपराधीनं पौरुषस्य क्रियाफलम् । यदि पुरुषार्थजनित कर्मका फल पराधीन न होता तो जिसकी जो इच्छा होती, उसीको वह प्राप्त कर लेता ॥ ८ ½ ॥ संयताश्चापि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः ॥ ९ ॥ दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः । किंतु बड़े-बड़े संयमी, कार्यकुशल और बुद्धिमान् मनुष्य भी अपना काम करते-करते थक जाते हैं तो भी वे इच्छानुसार फलकी प्राप्तिसे वंचित ही देखे जाते हैं ॥ ९ ½ ॥ भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः ॥ १० ॥ वञ्चनायां च लोकस्य स सुखी जीवते सदा । तथा दूसरा मनुष्य, जो निरन्तर जीवोंकी हिंसाके लिये उद्यत रहता है और सदा लोगोंको ठगनेमें ही लगा रहता है, वह सुखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है ॥ १० ½ ॥ अचेष्टमपि चासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति ॥ ११ ॥ कश्चित् कर्माणि कुर्वन् हि न प्राप्यमधिगच्छति । कोई बिना उद्योग किये चुपचाप बैठा रहता है और लक्ष्मी उसकी सेवामें उपस्थित हो जाती है और कोई सदा काम करते रहनेपर भी अपने उचित वेतनसे भी वञ्चित रह जाता है (ऐसा देखा जाता है) ॥ ११ ½ ॥ देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः ॥ १२ ॥ दशमासधृता गर्भे जायन्ते कुलपांसनाः ।