महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1456, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकितने ही दीन मनुष्य पुत्रकी कामना रखकर देवताओंको पूजते और कठिन तपस्या करते हैं, तो भी उनके द्वारा गर्भमें स्थापित तथा दस मासतक माताके उदरमें पालित होकर जो पुत्र पैदा होते हैं वे कुलांगार निकल जाते हैं* ॥ १२ १/२ ॥
अपरे धनधान्यैश्च भोगैश्च पितृसंचितैः ॥ १३ ॥
विपुलैरभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलैः ।
और दूसरे बहुत-से ऐसे भी हैं जो अपने पिताके द्वारा जोड़कर रखे हुए धन-धान्य तथा भोग-विलासके प्रचुर साधनोंके साथ पैदा होते हैं और उनकी प्राप्ति भी उन्हीं मांगलिक कृत्योंके अनुष्ठानसे होती है ॥ १३ १/२ ॥
कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशयः ॥ १४ ॥
आधिभिश्चैव बाध्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव ।
इसमें संदेह नहीं कि मनुष्योंके जो रोग होते हैं, वे उनके कर्मोंके ही फल हैं। जैसे बहेलिये छोटे मृगोंको पीड़ा देते हैं, उसी प्रकार वे रोग और आधि-व्याधियाँ जीवोंको पीड़ा देती रहती हैं ॥ १४ १/२ ॥
ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः सम्भृतौषधैः ॥ १५ ॥
व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज ।
ब्रह्मन्! (उनका भोग पूरा होनेपर) ओषधियोंका संग्रह करनेवाले चिकित्साकुशल चतुर चिकित्सक उन रोगव्याधियोंका उसी प्रकार निवारण कर देते हैं, जैसे व्याध मृगोंको भगा देते हैं ॥ १५ १/२ ॥
येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिताः ॥ १६ ॥
न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभृतां वर ।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कौशिक! देखो, जिनके यहाँ भोजनका भण्डार भरा पड़ा है, उन्हें प्रायः संग्रहणी सता रही है, वे उसका उपभोग नहीं कर पाते ॥ १६ १/२ ॥
अपरे बाहुबलिनः क्लिश्यन्ते बहवो जनाः ॥ १७ ॥
दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजनं द्विजसत्तम ।
विप्रवर! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी भुजाओंमें बल है—जो स्वस्थ और अन्नको पचानेमें समर्थ हैं, परंतु उन्हें बड़ी कठिनाईसे भोजन मिल पाता है—वे सदा ही अन्नका कष्ट भोगते रहते हैं ॥ १७ १/२ ॥
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् ॥ १८ ॥
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा ।
इस प्रकार यह संसार असहाय तथा मोह, शोकमें डूबा हुआ है। कर्मोंके अत्यन्त प्रबल प्रवाहमें पड़कर बार-बार उसकी आधि-व्याधिरूपी तरंगोंके थपेड़े सहता और विवश होकर इधर-से-उधर बहता रहता है ॥ १८ १/२ ॥