महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1457, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंन म्रियेयुर्न जीर्येयुः सर्वे स्युः सार्वकामिकाः ।। १९ ।।
नाप्रियं प्रतिपश्येयुर्वशित्वं यदि वै भवेत् ।
यदि जीव अपने वशमें होते तो वे न मरते और न बूढ़े ही होते। सभी सब तरहकी मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेते। किसीको अप्रिय घटना नहीं देखनी पड़ती ।। १९ १/२ ।।
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते ।
यतते च यथाशक्ति न च तद् वर्तते तथा ।। २० ।।
सब लोग सारे जगत्के ऊपर-ऊपर जानेकी इच्छा रखते हैं—सभी सबसे ऊँचा होना चाहते हैं और उसके लिये वे यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं परंतु (सभी जगह) वैसा होता नहीं है ।। २० ।।
बहवः सम्प्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमङ्गलाः ।
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु ।। २१ ।।
बहुत-से ऐसे मनुष्य देखे जाते हैं, जिनका जन्म एक ही नक्षत्रमें हुआ है और जिनके लिये मंगल कृत्य भी समानरूपसे ही किये गये हैं, परंतु विभिन्न प्रकारके कर्मोंका संग्रह होनेके कारण उन्हें प्राप्त होनेवाले फलमें महान् अन्तर दृष्टिगोचर होता है ।। २१ ।।
न केचिदीशते ब्रह्मन् स्वयंग्राह्यस्य सत्तम ।
कर्मणा प्राक् कृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ।। २२ ।।
ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कोई अपने हाथमें आयी हुई वस्तुका भी उपयोग करनेमें समर्थ नहीं है। इस जगत्में पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके ही फलकी प्राप्ति देखी जाती है ।। २२ ।।
यथाश्रुतिरियं ब्रह्मन् जीवः किल सनातनः ।
शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ।। २३ ।।
विप्रवर! श्रुतिके अनुसार यह जीवात्मा निश्चय ही सनातन है और इस संसारमें समस्त प्राणियोंका शरीर नश्वर है ।। २३ ।।
वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत ।
जीवः सङ्क्रमतेऽन्यत्र कर्मबन्धनिबन्धनः ।। २४ ।।
शरीरपर आघात करनेसे उस शरीरका नाश तो हो जाता है; किंतु अविनाशी जीव नहीं मरता। वह कर्मोंके बन्धनमें बँधकर फिर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर जाता है ।।
ब्राह्मण उवाच
कथं धर्मविदां श्रेष्ठ जीवो भवति शाश्वतः ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन वदतां वर ।। २५ ।।
ब्राह्मणने पूछा—धर्मज्ञों तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्याध! जीव सनातन कैसे है? मैं इस विषयको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ।। २५ ।।
व्याध उवाच