भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1458

न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्म्रियते किलेति । जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २६ ॥ धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! देहका नाश होनेपर जीवका नाश नहीं होता। मनुष्योंका यह कथन कि 'जीव मरता है' मिथ्या ही है, किंतु जीव तो इस शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें चला जाता है। शरीरके पाँचों तत्त्वोंका पृथक्-पृथक् पाँच भूतोंमें मिल जाना ही उसका नाश कहलाता है ॥ २६ ॥ अन्यो हि नाश्नाति कृतं हि कर्म मनुष्यलोके मनुजस्य कश्चित् । यत् तेन किंचिद्धि कृतं हि कर्म तदश्नुते नास्ति कृतस्य नाशः ॥ २७ ॥ इस मानवलोकमें मनुष्यके किये हुए कर्मको (उस कर्ताके सिवा) दूसरा कोई नहीं भोगता है। उसके द्वारा जो कुछ ही कर्म किया गया है, उसे वह स्वयं ही भोगेगा। किये हुए कर्मोंका कभी नाश नहीं होता ॥ सुपुण्यशीला हि भवन्ति पुण्या नराधमाः पापकृतो भवन्ति । नरोऽनुयातस्त्विह कर्मभिः स्वै- स्ततः समुत्पद्यति भावितस्तैः ॥ २८ ॥ पुण्यात्मा मनुष्य पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और नीच मनुष्य पापमें प्रवृत्त होते हैं। यहाँ अपने किये हुए कर्म मनुष्यका अनुसरण करते हैं और उनसे प्रभावित होकर वह दूसरा जन्म धारण करता है ॥ २८ ॥

ब्राह्मण उवाच

कथं सम्भवते योनौ कथं वा पुण्यपापयोः । जातीः पुण्यास्त्वपुण्याश्च कथं गच्छति सत्तम ॥ २९ ॥ ब्राह्मणने पूछा— सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! जीव दूसरी योनिमें कैसे जन्म लेता है, पाप और पुण्यसे उसका सम्बन्ध किस प्रकार होता है तथा उसे पुण्ययोनि और पापयोनिकी प्राप्ति कैसे होती है? ॥ २९ ॥

व्याध उवाच

गर्भाधानसमायुक्तं कर्मेदं सम्प्रदृश्यते । समासेन तु ते क्षिप्रं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम ॥ ३० ॥