भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1459

व्याधने कहा— विप्रवर! गर्भाधान आदि संस्कार-सम्बन्धी ग्रन्थोंद्वारा यह प्रतिपादन किया गया है ‘कि यह जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, सब कर्मोंका ही परिणाम है।’ अतः किस कर्मसे कहाँ जन्म होता है? इस विषयका मैं तुमसे संक्षिप्त वर्णन करता हूँ, सुनो ।। ३० ।।

यथा सम्भृतसम्भारः पुनरेव प्रजायते ।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ।। ३१ ।।
जीव कर्मबीजोंका संग्रह करके जिस प्रकार पुनः जन्म ग्रहण करता है, वह बताया जा रहा है। शुभकर्म करनेवाला मनुष्य शुभ योनियोंमें और पापकर्म करनेवाला पापयोनियोंमें जन्म लेता है ।। ३१ ।।

शुभैः प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैर्मानुषो भवेत् ।
मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्बिषी ।। ३२ ।।
शुभकर्मोंके संयोगसे जीवको देवत्वकी प्राप्ति होती है। शुभ और अशुभ दोनोंके सम्मिश्रणसे उसका मनुष्य-योनिमें जन्म होता है। मोहमें डालनेवाले तामस कर्मोंके आचरणसे जीव पशु, पक्षी आदिकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है और जिसने केवल पापका ही संचय किया है, वह नरकगामी होता है ।। ३२ ।।

जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः ।
संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ।। ३३ ।।
मनुष्य अपने ही किये हुए अपराधोंके कारण जन्म-मृत्यु और जरासम्बन्धी दुःखोंसे सदा पीडित हो बारंबार संसारमें पचता रहता है ।। ३३ ।।

तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च।
जीवाः सम्परिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धनाः ।। ३४ ।।
कर्मबन्धनमें बँधे हुए (पापी) जीव सहस्रों प्रकारकी तिर्यक् योनियों तथा नरकोंमें चक्कर लगाया करते हैं ।। ३४ ।।

जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतैः प्रेत्य दुःखितः ।
तद्दुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते ।। ३५ ।।
प्रत्येक जीव अपने किये हुए कर्मोंसे ही मृत्युके पश्चात् दुःख भोगता है और उस दुःखका भोग करनेके लिये ही वह (चाण्डालादि) पापयोनिमें जन्म लेता है ।।

ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यं नवं बहु ।
पच्यते तु पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः ।। ३६ ।।
वहाँ फिर नये-नये बहुत-से पापकर्म कर डालता है, जिसके कारण कुपथ्य खा लेनेवाले रोगीकी भाँति उसे नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं ।। ३६ ।।

अजस्रमेव दुःखार्तोऽदुःखितः सुखसंज्ञितः ।
ततोऽनिवृत्तबन्धत्वात् कर्मणामुदयादपि ।। ३७ ।।