भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 151

नरश्रेष्ठ! राजा शाल्वकी वह सेना सब प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके संचालनमें निपुण, रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई तथा पैदल सिपाहियों और ध्वजा-पताकाओंसे व्याप्त थी। उसका प्रत्येक सैनिक हृष्ट-पुष्ट एवं बलवान् था। सबमें वीरोचित लक्षण दिखायी देते थे। उस सेनाके सिपाही विचित्र ध्वजा तथा कवच धारण करते थे। उनके रथ और धनुष भी विचित्र थे। कुरुनन्दन! द्वारकाके समीप उस सेनाको ठहराकर राजा शाल्वने उसे वेगपूर्वक द्वारकाकी ओर बढ़ाया; मानो पक्षिराज गरुड़ अपने लक्ष्यकी ओर उड़े जा रहे हों ।। ५-७ ।।

तदापतन्तं संदृश्य बलं शाल्वपतेस्तदा । निर्याय योधयामासुः कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ८ ॥ शाल्वराजकी उस सेनाको आती देख उस समय वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले कुमार नगरसे बाहर निकलकर युद्ध करने लगे ।। ८ ।।

असहन्तोऽभियानं तच्छाल्वराजस्य कौरव । चारुदेष्णश्च साम्बश्च प्रद्युम्नश्च महारथः ॥ ९ ॥ ते रथैर्दशिताः सर्वे विचित्राभरणध्वजाः । संसक्ताः शाल्वराजस्य बहुभिर्योधपुङ्गवैः ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! शाल्वराजके उस आक्रमणको वे सहन न कर सके। चारुदेष्ण, साम्ब और महारथी प्रद्युम्न—ये सब कवच, विचित्र आभूषण तथा ध्वजा धारण करके रथोंपर बैठकर शाल्वराजके अनेक श्रेष्ठ योद्धाओंके साथ भिड़ गये ।। ९-१० ।।

गृहीत्वा कार्मुकं साम्बः शाल्वस्य सचिवं रणे । योधयामास संहृष्टः क्षेमवृद्धिं चमूपतिम् ॥ ११ ॥ हर्षमें भरे हुए साम्बने धनुष धारण करके शाल्वके मन्त्री तथा सेनापति क्षेमवृद्धिके साथ युद्ध किया ।। ११ ।।

तस्य बाणमयं वर्षं जाम्बवत्याः सुतो महत् । मुमोच भरतश्रेष्ठ यथा वर्षं सहस्रदृक् ॥ १२ ॥ तद् बाणवर्षं तुमुलं विषेहे स चमूपतिः । क्षेमवृद्धिर्महाराज हिमवानिव निश्चलः ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! जाम्बवतीकुमारने उसके ऊपर भारी बाणवर्षा की, मानो इन्द्र जलकी वर्षा कर रहे हों। महाराज! सेनापति क्षेमवृद्धिने साम्बकी उस भयंकर बाणवर्षाको हिमालयकी भाँति अविचल रहकर सहन किया ।। १२-१३ ।।