भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1586, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1586

पृथ्वी हिलने लगी। उसमें गड़गड़ाहट पैदा हो गयी। सारा जगत् अन्धकारमें मग्न-सा जान पड़ता था। उस समय यह दारुण उत्पात देखकर भगवान् शंकर, महाभागा उमा, देवगण तथा महर्षिगण क्षुब्ध हो उठे ।।

ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसंनिभम् ।। ६१ ।।
नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महत् बलम् ।
तद् वै घोरमसंख्येयं गर्जच्च विविधा गिरः ।। ६२ ।।
जिस समय वे सब लोग मोहग्रस्त हो रहे थे, उसी समय पर्वतों और मेघमालाओंके समान दैत्योंकी विशाल एवं भयंकर सेना दिखायी दी। वह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी। उसके सैनिकोंकी संख्या गिनी नहीं जा सकती थी। वह भयंकर वाहिनी अनेक प्रकारकी बोली बोलती हुई भीषण गर्जना कर रही थी ।।

अभ्यद्रवद् रणे देवान् भगवन्तं च शङ्करम् ।
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकoptions: बाणजालान्यनेकशः ।। ६३ ।।
उसने रणभूमिमें आकर देवताओं तथा भगवान् शंकरपर धावा बोल दिया। दैत्योंने देवताओंके सैनिकोंपर कई बार बाण-वर्षा की ।। ६३ ।।

पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासासिपरिघा गदाः ।
निपतद्भिेश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महायुधैः ।। ६४ ।।
क्षणेन व्यद्रवत् सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत ।
शिलाखण्ड, शतघ्नी (तोप), प्रास, खड्ग, परिघ और गदाओंके लगातार प्रहार हो रहे थे। इन भयंकर महान् अस्त्रोंकी मारसे देवताओंकी सारी सेना क्षणभरमें (पीठ दिखाकर) भाग चली। सारे सैनिक युद्धसे विमुख दिखायी देते थे ।। ६४ ½ ।।

निकृत्तयोधनागाश्वं कृतायुधमहारथम् ।। ६५ ।।
दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ ।
बहुत-से योद्धा, हाथी और घोड़े काट डाले गये। असंख्य आयुध और बड़े-बड़े रथ टूक-टूक कर दिये गये। इस प्रकार दानवोंद्वारा पीड़ित हुई देवताओंकी सेना युद्धसे विमुख हो गयी ।। ६५ ½ ।।

असुरैर्वध्यमानं तत् पावकैरिव काननम् ।। ६६ ।।
अपतत् दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं यथा ।
जैसे आग समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार असुरोंने देवताओंकी सेनामें भारी मार-काट मचा दी। बड़े-बड़े वृक्षोंसे भरे हुए वनका अधिकांश भाग जल जानेपर उसकी जैसी दुरवस्था दिखायी देती है, उसी प्रकार दैत्योंकी अस्त्राग्निमें अधिकांश सैनिकोंके दग्ध हो जानेके कारण वह देवसेना धराशायिनी हो रही थी ।।

ते विभिन्नशिरोदेहाः प्राद्रवन्तो दिवौकसः ।। ६७ ।।
न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे ।

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