महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1588, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! देवताओंके बाणोंसे विदीर्ण हुए वे दैत्योंके शरीर सब प्रकारसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान धरतीपर गिरने लगे ।। ७५ १/२ ।। ततस्तद् दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि ।। ७६ ।। त्रासितं विविधैर्बाणैः कृतं चैव पराङ्मुखम् । तदनन्तर समस्त देवताओंने उस युद्धमें दानवसेनाको अपने विविध बाणोंके प्रहारसे भयभीत करके रणभूमिसे विमुख कर दिया ।। ७६ १/२ ।। अथोत्कृष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदायुधैः ।। ७७ ।। संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त ह्यनेकversion/नेकtext: ह्यनेकversion: ह्यनेकशः । फिर तो उस समय हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र उठाये सम्पूर्ण देवता हर्षमें भरकर कोलाहल करने लगे और अनेक प्रकारके विजय-वाद्य एक साथ बज उठे ।। ७७ १/२ ।। एवमन्योन्यसंयुक्तं युद्धमासीत् सुदारुणम् ।। ७८ ।। देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम् । अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत ।। ७९ ।। तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः । इस प्रकार देवताओं और दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। रक्त और मांससे वहाँकी भूमिपर कीचड़ जम गयी थी। फिर सहसा बाजी पलट गयी। देवलोककी पराजय दिखायी देने लगी। भयंकर दानव देवताओंको मारने लगे ।। ७८-७९ १/२ ।। ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनः ।। ८० ।। बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः । उस समय दानवेन्द्रोंके भयंकर सिंहनाद सुनायी पड़ते थे। उनके रणवाद्यों तथा भेरियोंका गम्भीर घोष सब ओर गूँज उठा ।। ८० १/२ ।। अथ दैत्यबलाद् घोरान्निष्पपात महाबलः ।। ८१ ।। दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम् । इतनेहीमें दैत्योंकी भयंकर सेनासे महाबली दानव ‘महिष’ हाथोंमें एक विशाल पर्वत लिये निकला और देवताओंपर टूट पड़ा ।। ८१ १/२ ।। ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वा सम्परिवारितम् ।। ८२ ।। तमुद्यतगिरिं राजन् व्यद्रवन्त दिवौकसः । राजन्! बादलोंसे घिरे हुए सूर्यकी भाँति पर्वत उठाये हुए उस दानवको देखकर सब देवता भाग चले ।। ८२ १/२ ।। अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् ।। ८३ ।। पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव । भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद् भुवि ।। ८४ ।।