महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1592, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः । लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ॥ ९३ ॥ उन्होंने अपने शरीरको लाल वस्त्रोंसे आच्छादित कर रखा था। उनके हार और आभूषण भी लाल रंगके ही थे। उनके घोड़ेका रंग भी लाल था। उन महाबाहु भगवान् स्कन्दने सुवर्णमय कवच धारण किया था ॥ ९३ ॥
रथमादित्यसंकाशमास्थितः कनकप्रभम् । तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत् सहसा रणे ॥ ९४ ॥ वे सूर्यके समान तेजस्वी रथपर विराजमान थे। उनकी अंगकान्ति भी सुवर्णके समान ही उद्भासित हो रही थी। उन्हें सहसा संग्राममें उपस्थित देख दैत्योंकी सेना रणभूमिसे भाग चली ॥ ९४ ॥
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् । मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः ॥ ९५ ॥ राजेन्द्र! महाबली महासेनने महिषासुरपर एक प्रज्वलित शक्ति चलायी, जो उसके शरीरको विदीर्ण करनेवाली थी ॥ ९५ ॥
सा मुक्ताभ्यहरत् तस्य महिषस्य शिरो महत् । पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ॥ ९६ ॥